Friday, January 7, 2011

सूचना देने के पहले मांगा जा रहा जनहित का प्रमाणपत्र

सूचना के अधिकार की ताकत को जनता ने जब पहचानना शुरू किया तो अधिकारी भी जान फंसने के डर से कई तरह के मनमाने नियम तैयार करने में लगे हैं। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने भी सूचना देने के नाम पर एक अजीब शर्त रख दी है। आवेदक से प्रमाण पत्र मांगा जा रहा है कि सिर्फ जनहित में इसका इस्तेमाल करना होगा, इसके बाद ही जवाब देने को कहा गया है। यह कारनामा एक सूचना का जवाब मांगने पर सामने आया है। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के सदस्य नरेश कुमार ने 23 मार्च को स्वास्थ्य विभाग में दो बिंदुओं पर सूचना मांगी थी। उन्होंने विभाग से पूछा था कि जिले में कितने स्वास्थ्य कार्यक्रम चल रहे हैं, इन पर कितना पैसा खर्च किया जा रहा है, कौन सी एनजीओ सेवाएं दे रही है, इन्हें क्या भुगतान दिया जा रहा है और कार्यक्रमों की प्रगति रिपोर्ट बताएं। इसके साथ ही नाको द्वारा जिले में चलाए जा रहे कार्यक्रमों और उन पर खर्च होने वाले बजट के बारे में जानकारी मांगी गई थी। पहले तो विभाग ने सूचना का कोई जवाब नहीं दिया। अधिकारियों को रिमाइंडर भेजने पर उन्होंने आवेदक को इस आशय का पत्र थमा दिया कि जवाब चाहने से पहले आप विभाग में प्रमाण पत्र दें कि संबंधित सूचना का उपयोग सिर्फ जनहित में ही करेंगे। इसके बाद ही सूचना उपलब्ध कराई जा सकेगी। दरअसल विभाग द्वारा सूचना के बदले मांगे जा रहे प्रमाण पत्र को देना किसी के लिए व्यवहारिक नहीं है क्योंकि सूचना के अधिकार-2005 के नियमों के मुताबिक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। इस बारे में जब मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. रामरतन से बात की गई तो उन्होंने नियमों के अंतर्गत जनहित में कार्रवाई की बात कही।

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