Wednesday, December 29, 2010
आरटीआई एक्ट में संशोधन कानून की भावना के खिलाफ
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में प्रस्तावित संशोधन का घोर विरोध किया जा रहा है। आरटीआई एक्टिविस्ट का कहना है कि इस लोकप्रिय कानून को कुचलने की साजिश के तहत नौकरशाहों के दबाव में यह संशोधन पेश किया गया है। आरटीआई एक्टिविस्टों की माने तो आरटीआई अर्जी को 250 शब्दों में सीमित करने और उसका शुल्क दस रुपये से अधिक करने का प्रस्ताव आरटीआई की मूल भावना के खिलाफ है। उनका कहना है कि पार्रदशिता कानून शासन को जवाबदेह बनाने के मकसद से लाया गया था। लेकिन इसकी अपार सफलता से सरकारी अफसरों का एक तबका बौखला गया है। यह र्वग किसी न किसी तरह पार्रदशिता कानून को खत्म करना चाहता है। आरटीआई एक्टिविस्ट कमोडोर लोकेश बत्रा का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन में कहा गया है कि आरटीआई का शुल्क संबंधित सूचना अधिकारी को ही देय होगा। इससे सूचना चाहने वालों को परेशानी का सामना करना पड़ेगा। अभी डाकघर के जरिए शुल्क अदा करके आरटीआई अर्जी संबंधित सूचना अधिकारी को भेजी जा सकती है लेकिन संशोधन के बाद ऐसा संभव नहीं हो पाएगा। आयोग में याची की उपस्थिति को अनिवार्य बनाने से आरटीआई भी किसी अन्य अदालत के समान हो जाएगा। अभी तक आयोग के समक्ष शिकार्यतकता का पहुंचना अनिवार्य नहीं है। अधिसंख्य अपील याची की उपस्थिति के बिना ही निपटाई जाती है। इससे लोगों का आने-जाने का समय और धन बचता है। द्वितीय अपील के लिए निर्धारित आयोग दिल्ली में है।
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