Sunday, January 23, 2011

असंतोषजनक है लोकपाल विधेयक


संविधानविद सरकार द्वारा जिस स्वरूप में लोकपाल विधेयक लाया जा रहा है वह काफी असंतोषजनक है। यदि यह बिल इसी स्वरूप में पारित होता है तो लोकपाल के पास जो शक्तियां होंगी वह काफी सीमित होंगी, क्योंकि उसके दायरे से संसद सदस्य, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा सभापति और सुप्रीम कोर्ट के जज और राष्ट्रपति बाहर होंगे। राष्ट्रपति को इसके बाहर रखने का तर्क तो समझ में आता है, क्योंकि वह कोई भी निर्णय मंत्रिमंडल के सलाह से लेता है। यहां एक और महत्पूर्ण सवाल न्यायपालिका को इसके दायरे से बाहर रखने का है। आज जब न्यायपालिका पर दूसरे कई क्षेत्रों की तरह भ्रष्टाचार के लांछन लग रहे हैं और साबित हो रहे हैं तो ऐसे में लोकपाल की तीन सदस्यीय संस्था में सभी सदस्य न्यायपालिका के रखे जाने का औचित्य समझ में नहीं आता है। इसी तरह जब कभी लोकपाल के सामने न्यायपालिका के मामलों की जांच का विषय आएगा तो क्या यह सदैव निष्पक्ष होंगे और वह गलत नहीं हो सकते। आज की परिस्थिति को देखते हुए यह दावा कम से कम कोई विवेकशील व्यक्ति तो नहीं ही कर सकता। बेहतर होता कि इस समिति में सिविल सोसायटी और दूसरे क्षेत्रों के योग्य लोगों को भी प्रतिनिधित्व व सदस्यता दी जाए ताकि यह संस्था अधिक पारदर्शी और सक्षम बन सके। समाज के विभिन्न क्षेत्रों में यदि योग्य लोग मिलते हैं तो उन्हें इसमें शामिल किया जाना चाहिए। इसमें समाजशास्त्री, शिक्षाशास्त्री, समाजसेवा के क्षेत्र में अग्रणी लोगों को स्थान दिया जा सकता है। इसी तरह संसद सदस्यों के मामले में लोकपाल की भूमिका अप्रभावी होगी, क्योंकि इनके खिलाफ किसी मामले की जांच के लिए लोकसभाध्यक्ष अथवा राज्यसभा के सभापति से अनुमति की आवश्यकता होगी और जांच पूरी करने के बाद भी मामले को आगे बढ़ाने और दोषियों के खिलाफ किसी कार्रवाई यह संस्था नहीं कर सकेगी। दंड अथवा सजा सुनाने और इसे कार्यान्वित करने का कार्य संबंधित सदन के प्रमुख को होगा। इससे साफ है कि लोकपाल की भूमिका केवल सिफारिशी प्रकृति की होगी। इस तरह की संस्थाएं पहले ही हैं तो फिर नए संस्था की जरूरत ही क्या है? भारत में भ्रष्टाचार आज एक कैंसर का रूप लेती जा रही है, जिसके इलाज के लिए दृढ़ व ईमानदार राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है ताकि प्रशासकीय, राजनीतिक, न्यायिक व सेना के भ्रष्टाचार को रोका जा सके। संयुक्त सचिव से ऊपर के पदों पर बैठे नौकरशाहों के खिलाफ जांच के लिए गृहमंत्रालय से अनुमति की जरूरत होती है जो राष्ट्रपति देती हैं। इस व्यवस्था को भी बदले जाने की जरूरत है। यहां इस बात पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि लोकपाल विधेयक की संकल्पना स्कैंडेनेवियन देश के ओंबुड्समैन से ली गई है। ओंबुड्मैन की तीन प्रमुख भूमिका होती है, इसमें पहला है प्रशासनिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति को मिले विवेकाधिकार के दुरुपयोग के मामलों की जांच का। इसके तहत यदि प्रशानिक स्तर पर कोई धांधली की जाती है तो यह संस्था स्वत:स्फूर्त तरीके से जांच कर सकती है और दोषियों को दंडित कर सकती है। इसमें दूसरा पहलू है प्रशासनिक मामलों में देरी का जिसमें यह देखा जाता है कि किसी प्रशासकीय मसले पर निर्णय लेने में देरी तो नहीं की गई अथवा किसी मामले को तय करने में विलंब तो नहीं हुआ। यदि ऐसा कुछ हुआ है तो उसका उद्देश्य क्या था और किस कारण से यह सब हुआ। इस तरह की जांच का उद्देश्य प्रशासनिक कार्यो में तेजी लाना और उसमें पारदर्शिता को बढ़ाना होता है। इसके अलावा ओंबुड्समैन भ्रष्टाचार के मामलों की भी स्तंत्र जांच करता है। इसके जांच दायरे में प्रशासनिक अधिकारी, संसद सदस्य, न्यायपालिका के जज और सेना के अधिकारी शामिल होते हैं। इस रूप में यदि हम विचार करें तो साफ है कि हमारे यहां जिस स्वरूप में लोकपाल बिल को लाया जा रहा है वह इन स्वरूपों पर खरा नहीं उतरता, बल्कि इसे एक सिफारिशी समिति तक सीमित कर दिया गया है। आज भ्रष्टाचार के मामले जिस तरह तेजी से बढ़ रहे हैं उन्हें नियंत्रित करने व रोकने के लिए लोकपाल को अधिक अधिकार देने होंगे और उस पर राजनीतिक नियंत्रण कम से कम रखने होंगे ताकि वह अपनी भूमिका का ईमानदार निर्वहन कर सके। इसके लिए सरकार और राजनीतिज्ञों को अधिक सदाशयता व राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी। इसके बिना यह संस्था काफी कमजोर होगी।


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