Sunday, January 9, 2011

छह दशक लंबी हताशा

जनवरी का महीना शुरू होते ही देश में गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारियां प्रारंभ हो जाती हैं। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां यह संकल्प लिया गया कि जनता का राज्य जनता द्वारा ही बनेगा और जनता के लिए ही काम भी करेगा। हमने अपने संविधान में वचन भी दिया कि हम भारत के लोग अपने सार्वभौम राज्य में धर्मनिरपेक्ष रहेंगे, सभी नागरिकों को हम न्याय देंगे तथा आर्थिक और राजनीतिक समानता सबको प्राप्त होगी। पंडित नेहरू ने देश को यह संदेश दिया कि नए संविधान द्वारा भूखे को अन्न, नंगे को वस्त्र और प्रत्येक भारतीय को यह अवसर दिया जाएगा कि उसमें जितनी योग्यता है, उसके अनुसार वह जीवन में सर्वांगीण उन्नति कर सके।
आजादी के बाद राष्ट्र के प्रति अपनी वचनबद्धता उन नेताओं ने जताई थी, जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था। पूरे राष्ट्र को यह आशा थी कि अब भारत का ऐसा नवनिर्माण होगा, जिसमें किसी को विवशता में जूठे पत्तल चाटते हुए नहीं देखना पड़ेगा, कोई गरमी-सर्दी में बिना छत के मौत के मुंह में नहीं जाएगा, कोई भूख से नहीं मरेगा, कोई नंगे तन एक कपड़ा पाने के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएगा। पर आजादी के छह दशक बीत जाने के बावजूद वे सपने पूरे नहीं हो पाए। इसकी वजह यह है कि अब लोकतंत्र की जगह परिवारतंत्र, नोटतंत्र और डंडातंत्र कायम हो गया है।
पिछले साल देश के गोदामों में पड़ा लाखों टन अनाज सड़ गया, कीड़ों से भर गया और इस योग्य भी न रहा कि पशु भी उसे खा सकें। देश में ऐसे लोगों की संख्या भी अनगिनत है, जिनके पेट-पीठ मिलकर एक हो गए हैं। हालत यह हो गई कि भूखों की पीड़ा से पीड़ित होकर सर्वोच्च न्यायालय को कहना पड़ा कि सरकार गोदामों में पड़ा अनाज गरीबों को मुफ्त बांट दे। यद्यपि यह आदेश लागू न हो सका और लोग महंगाई की मार तले सिसकते भूख से तड़पते रहे। मगर संविधान की शपथ लेनेवालों ने उनकी भूख मिटाने की कोशिश नहीं की।
आज भी दरिद्रता की सीमा यह है कि करोड़ों लोग अपना तन ढकने में असमर्थ हैं। दूसरी तरफ शासक और राजनेता जनता की कमाई पर अपनी सुविधाओं और सुरक्षा के लिए करोड़ों खर्च करते हैं, वातानुकूलित कमरों में बैठकर उन लोगों के लिए योजनाएं बनाते हैं, जिनकी पीड़ा से वे परिचित भी नहीं।
सभी देशवासियों को तरक्की का एक समान अवसर देने की बात भी अब किसी को याद नहीं। देश के शासक क्या यह नहीं जानते कि शिक्षा का व्यापारीकरण हो गया है और जनता का जो वर्ग बढ़ती महंगाई के कारण दो वक्त की रोटी तक के लिए तरस गया है, वह बड़े-बड़े शिक्षा संस्थानों और विश्वविद्यालयों में अपने बच्चों को कैसे शिक्षा दिला पाएगा?
आम आदमी के दर्द से अपरिचित संविधान की शपथ लेने वाले लोग 26 जनवरी को बड़े-बड़े भाषण तो देंगे, पर उन्हें पंडित नेहरू तथा संविधान सभा के विद्वतजनों द्वारा देश को दिए गए वचन की कोई चिंता नहीं होगी। क्या यह नहीं होना चाहिए कि जिस संविधान की हम शपथ लेते हैं, पहले उसे पढ़ा व समझा जाए, और अगर उसकी रक्षा के हम योग्य हैं, तभी संकल्प लें।
वैसे समता है कहां? सरकार के उच्च पदों पर आसीन नेता और अधिकारी अगर बीमार हो जाएं, तो सपरिवार हवाई मार्ग से यूरोप और अमेरिका इलाज के लिए पहुंचते हैं, जबकि आम आदमी सरकारी अस्पतालों में तड़पता चिकित्सा सुविधाओं के बिना दम तोड़ देता है। इन अस्पतालों में डॉक्टर मिल भी जाएं, तो दवा नहीं मिलती। आम आदमी जानता ही नहीं कि उसके अधिकारों पर, उसकी रोटी और कपड़े पर, उसके बच्चों की दवा और पढ़ाई पर जिन्होंने कब्जा जमा रखा है, वास्तव में वही उनकी दुर्गति का असली अपराधी है। देश के प्रबुद्धजन अगर जागें, तो कम से कम यह तो हो ही सकता है कि जो लोग आम जन के अधिकार दबाकर विशिष्ट जन बने बैठे हैं, उन्हें संविधान लागू करने की वर्षगांठ पर भाषण तो न करने दें। जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उसी दिन जनता को सुख की सांस लेने का अवसर मिलेगा।


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