भ्रष्टाचार के पड़े छीटों को धोने के लिए मनमोहन सिंह सरकार और कांग्रेस पार्टी हाथ-पांव तो खूब मार रही हैं, लेकिन लोगों का भरोसा कुछ इस तरह हिल गया है कि ये तमाम कोशिशें बेअसर साबित हो रही हैं। इसकी सबसे बड़ी मिसाल संभवत: लोकपाल विधेयक है। यूपीए-एक के जमाने से कांग्रेस पार्टी के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की स्वच्छ छवि एक ढाल रही है। पिछले साल भ्रष्टाचार के खुलासों की झड़ी लग जाने के बाद से कांग्रेस ने एक बार फिर इसी ढाल के जरिये अपना बचाव करने की रणनीति अपनाई हुई है। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में प्रधानमंत्री की संसद की लोक लेखा समिति के सामने खुद पेश होने की पेशकश को इसी रणनीति का हिस्सा माना गया। अब लोकपाल विधेयक के दायरे में प्रधानमंत्री को लाने की घोषणा को भी इसी रूप में देखा जा रहा है। आम लोगों को भरोसा नहीं है कि सरकार सचमुच भ्रष्टाचार से लड़ना चाहती है, बल्कि आम धारणा यही है कि वह सिर्फ ऐसा करती हुई दिखना चाहती है। देश में लोकपाल नाम की एक संस्था बने, जो सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ शिकायतों की जांच कर सके। यह देश के जागरूक जनमत की बहुत पुरानी मांग है। राजनीतिक दलों की तरफ से पिछले चार दशक से लोकपाल कानून पारित कराने के लिए वादे किए जाते रहे हैं, लेकिन जब भी कोई पार्टी सत्ता में आती है तो वह इससे मुकर जाती है। इंद्र कुमार गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में यह विधेयक तैयार किए गए, लेकिन वह आम जन को संतुष्ट नहीं कर पाए। 2004 में प्रधानमंत्री बनते ही मनमोहन सिंह ने वादा किया कि उनकी सरकार इस कानून को पारित कराने में वक्त नहीं लगाएगी, लेकिन सात साल गुजर चुकने के बाद प्रधानमंत्री को इसका ख्याल तब आया जब उनकी सरकार की साख में कई सुराख हो चुके हैं। अब यह साफ है कि संसद के अगले सत्र में लोकपाल विधेयक पेश करने की तमाम चर्चाओं के बावजूद सरकार की साख में सुधार होता दिख नहीं रहा। कारण यह है कि एक बार फिर लोकपाल के नाम पर ऐसी संस्था बनाने की कोशिश हो रही है जो राजकाज के मौजूदा तौर-तरीकों में बदलाव लाने में कतई सक्षम नहीं है। यही कारण है कि सिविल सोसायटी के अनेक संगठन और कार्यकर्ता प्रस्तावित विधेयक को दंतहीन बता रहे हैं। इन्होंने इसकी खामियों की तरफ सरकार का ध्यान खींचा है। प्रस्तावित विधेयक के मुताबिक लोकपाल तीन सदस्यों वाली संस्था होगी, जिसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या पूर्व प्रधान न्यायाधीश होंगे और बाकी दो सदस्य सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा या पूर्व जज अथवा हाईकोर्ट के मौजूदा या पूर्व मुख्य न्यायाधीश होंगे। सिविल सोसायटी के संगठनों की राय है कि लोकपाल की सदस्यता को जजों तक सीमित कर देना इसके स्वरूप को संकीर्ण बना देता है। उनके मुताबिक यह संस्था पांच सदस्यों वाली होनी चाहिए और प्रतिष्ठित समाजशास्त्री या शिक्षाशास्ति्रयों को भी इसकी सदस्यता के योग्य माना जाना चाहिए। प्रस्तावित विधेयक में ऐसा संकेत दिया गया है कि प्रधानमंत्री, अन्य मंत्री और सांसद लोकपाल की जांच के दायरे में आएंगे, लेकिन इस प्रावधान को इस शर्त से बेअसर बना दिया गया है कि लोकपाल संसद के किसी सदन के सदस्य के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच तभी कर सकेगा, जब लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति से इसके लिए मंजूरी या सिफारिश मिले। यदि आरोप में कोई सच्चाई पाई गई तो लोकपाल सिर्फ यह करने में सक्षम होगा कि वह अपने निष्कर्ष लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को भेज दे। आगे कार्रवाई क्या करनी है, यह अध्यक्ष या सभापति ही तय करेंगे। इनकी एक मांग यह भी है कि लोकपाल के दायरे में राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, राज्यसभा के उप सभापति, सुप्रीम कोर्ट के जजों और अन्य संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों को भी शामिल किया जाए। परंतु प्रस्तावित विधेयक से इन जनअपेक्षाओं को पूरा नहीं किया जा सकेगा। ये खामियां सामने आ चुकी हैं और लोगों की प्रतिक्ति्रया से यह साफ है कि सरकार की यह कोशिश उस पर पड़े छीटों को धोने में नाकाम रहेगी। दरअसल, कांग्रेस और यूपीए सरकार के साथ मुश्किल यह है कि वे आज से तीन या चार दशक पुरानी मानसिकता में जी रही है। उन्हें लगता है कि तब की तरह आज भी कुछ लुभावनी बातें करके और कुछ दिखावटी कदम उठाकर वे जनमत को भ्रमित कर सकते हैं। जबकि अब ऐसा करना मुमकिन नहीं है। सिर्फ लोकपाल बिल जैसे कदमों से लोगों की निगाह में सरकार की साख फिर से कायम नहीं हो जाएगी और न ही कांग्रेस के बुराड़ी अधिवेशन में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सुझाए गए पांच सूत्री फार्मूले से पार्टी अपनी साख वापस पा पाएगी। लोगों के सामने अब यह साफ है कि जिस समय मनमोहन सिंह सरकार लोकपाल बिल लाने की बात कर रही है, उसी समय वह सूचना के अधिकार कानून के नियमों में ऐसे फेरबदल की कोशिश में भी जुटी हुई है जिससे यह कानून दंतहीन हो जाएगा। जो सरकार सचमुच भ्रष्टाचार मिटाना चाहती हो या प्रशासन में पारदर्शिता लाना चाहती हो, वह आखिर इस तरह के कदमों के बारे में सोच भी कैसे सकती है? लोग इस बात से भी वाकिफ हैं कि कैसे अपने दूसरे कार्यकाल में मनमोहन सिंह सरकार उन तमाम सोशल एजेंडे को पलट रही है, जिसकी वजह से उसके पहले कार्यकाल में उसकी सोशल डेमोक्रेटिक छवि बनी थी। यह सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून के तहत चल रही योजनाओं में काम करने वाले मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी देने को तैयार नहीं है। यह खाद्य सुरक्षा का ऐसा कानून पास करने को तैयार नहीं है जिससे सचमुच देश में सबको रोजाना दो बार भोजन मिल सके। वन अधिकार कानून के अमल की खामियां खुद सरकारी समितियों की रपटों से बेनकाब हो चुकी हैं, लेकिन इनमें से किसी बात से मनमोहन सिंह की नींद हराम नहीं होती। सोनिया गांधी को सुझाव देने के लिए एक राष्ट्रीय सलाहकार समिति यानी एनएसी है, जिसमें आम जनता के हितों की चिंता करने वाली कुछ शख्सियतें हैं। इन शख्सियतों के तर्क और संघर्ष से एनएसी आम जन के हित में जो सुझाव देती है मनमोहन सिंह सरकार उसे खारिज कर देती है। यह एक विचित्र विरोधाभास है कि सोनिया गांधी खुद अपने दस्तखत से किए गए सुझावों को कूड़ेदान में डाल दिए जाने की लगातार मिलती मिसालों के बावजूद चुप रहती हैं। या कहें कि उनका मनमोहन सिंह की छवि से मोहभंग नहीं होता और इस तरह यूपीए-एक के समय में कांग्रेस एवं यूपीए का जो सामाजिक आधार बना था और उसकी जो छवि बनी थी, वह अब हर रोज बिखरती जा रही है। अगर इस परिघटना को एक व्यापक संदर्भ में समझना हो तो हम कह सकते हैं कि 2004 में मिले जनादेश के साथ 2008 में वामपंथी दलों से संबंध तोड़कर कांग्रेस ने जो पलटी खाई, अब उसके नतीजे उसे खुद भुगतने पड़ रहे हैं। वामपंथी दलों के समर्थन पर जब तक यूपीए सरकार निर्भर थी, उनके दबाव में उसे वो सामाजिक एजेंडा अपनाना पड़ता था, जिसका सियासी फायदा कांग्रेस और यूपीए में शामिल दूसरे दलों को 2009 के आम चुनाव में मिला। सूचना का अधिकार, नरेगा, वन अधिकार कानून आदि उसकी मिसाल हैं, लेकिन वामपंथी दलों से पीछा छुड़ाने के बाद मनमोहन सिंह अपनी सरकार को अपनी आस्था यानी नव-उदारवादी नीतियों के रास्ते पर ले चले। इसका परिणाम यह निकला है कि उनकी सरकार आज क्रोनी कैपिटलिज्म यानी सिफारिशी पूंजीवाद का एक माध्यम बन गई नजर आती है। भ्रष्टाचार इस पूरी परिघटना का सिर्फ एक हिस्सा है। बेलगाम महंगाई, गरीब जनता के प्रति बेफिक्री और जनतंत्र के न्यायकारी उद्देश्यों के प्रति पूरी लापरवाही इस कथा के बाकी अध्याय हैं। सोनिया गांधी या मनमोहन सिंह इस हकीकत से आंख मूंदकर अपनी पार्टी या सरकार की छवि नहीं सुधार सकते। आज वो सवालों के घेरे में हैं तो उन्हें इन बड़े सवालों के जवाब ढूंढ़ने होंगे। दंतहीन लोकपाल जैसे फौरी कदमों का जमाना अब गुजर चुका है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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