हमारा संविधान एक ऐसी छतरी है, जो सबको एक समान सुरक्षा देना चाहती है। सामर्थ्यवान लोग अकसर इस छतरी में छेद करते रहते हैं, क्योंकि वे अपने को दूसरों से ऊपर समझते हैं। पर कभी-कभी इन्हीं छेदों में उनकी गरदन भी फंस जाती है, और कई बार यही छतरी गरीब की लाठी भी बन जाती है। तो इसका शुक्र क्यों न मनाएं
ट्रेन चार घंटे लेट थी। स्टेशन पर हंगामा मचा हुआ था। एक आदमी तमतमाया हुआ स्टेशन अधीक्षक के कमरे में घुसा और गुस्से से कहा, ‘अगर आप लोग टाइम से गाड़ियां नहीं चला सकते, तो बाहर टाइम टेबल क्यों लगा रखा है?’ स्टेशन अधीक्षक ने मुस्कराते हुए कहा, ‘अगर टाइम टेबल न हो, तो आपको पता कैसे चलेगा कि गाड़ी कितनी लेट है!’ उस समय मुझे स्टेशन अधीक्षक की बात में उसके पद का दंभ नजर आया, जो व्यवस्था का मजाक उड़ाता-सा लग रहा था। परंतु आज लगता है कि उसकी बात में दम था। हम किसी व्यवस्था की खामियों के बारे में अगर खुलकर बोल पा रहे हैं, तो हमारा यह बोल पाना ही उस व्यवस्था के महत्व को रेखांकित करता है। अगर हममें व्यवस्था की खामियों को पहचानने का विवेक और उनके खिलाफ बोल पाने का साहस है तो उन खामियों को दूर कर पाना भी सर्वथा संभव है। मसलन अपने संविधान के बारे में ही अगर हम कहते हैं कि यह सबके लिए सुरक्षा की छतरी नहीं बन सका, तो हम यह मान रहे होते हैं कि सब के लिए सुरक्षा की छतरी होना इसकी मूलभावना है, लेकिन स्वार्थी तत्वों ने इसे उस मूल भावना से दूर कर दिया। पर इस वजह से उस छतरी की उपयोगिता कम नहीं हो जाती।
संविधान हमारे गणतंत्र को एक व्यवस्था देता है। हमारे कर्णधार अपने को किसी भी व्यवस्था से ऊपर समझते हैं, इसलिए वे इस व्यवस्था में लगातार छेद करते रहते हैं। पर हमें इस बात के लिए शुक्र मनाना चाहिए कि छेदों से तार-तार ही सही, हमारे पास सुरक्षा के लिए संविधान की एक छतरी तो है। अगर हम अपने पड़ोसी पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, चीन आदि देशों में लोकतंत्र की स्थिति और मनुष्य के मूल अधिकारों पर एक नजर डालें, तो अपनी इस छेदवती छतरी पर भी गर्व की अनुभूति होती है। वैसे यह बात तो किसी भी व्यवस्था में सच होती है कि समरथ को नहिं दोष गुसाईं। सामर्थ्यवान लोग किसी भी व्यवस्था में अपने हिसाब से छेद कर लेते हैं। हमारा संविधान और हमारा तंत्र भी कोई अपवाद नहीं हैं, लेकिन जरा सोचिए कि इस व्यवस्था की जगह पूर्ण अव्यवस्था या चरम अराजकता होती तो, ये सामर्थ्यवान लोग कैसा तांडव मचाते?
बात को ज्यादा सैद्धांतिक जुमलों में उलझाने के बजाय आइए सीधे-सीधे कुछ उदाहरणों के जरिए संविधान की इस छतरी के महत्व को समझें। राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार का मामला पिछले दिनों सुर्खियों में रहा। इस घोटाले के बहाने लोग पूरे तंत्र को ही कटघरे में खड़ा करते नजर आए। पर वास्तव में यह तंत्र की ही ताकत है कि सुरेश कलमाड़ी सीबीआई जांच के कटघरे में हैं और उनके सहयोगी दरबारी ही उनकी ओर उंगली उठाने का साहस दिखा रहे हैं।
पिछले दिनों बांदा में शीलू नाम की एक लड़की ने आरोप लगाया कि बसपा विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी ने उसके साथ दुराचार किया और उस पर चोरी का आरोप लगाकर जेल में भी बंद करवा दिया। इस घटना को सुनने के बाद आम प्रतिक्रिया यही थी कि इस देश में कानून का राज कहां है? हवा में सवाल थे कि सत्ताधारी दल के विधायक पर कौन हाथ डालेगा, पर यह कानून के लंबे हाथों की ही ताकत है कि विधायक विधानसभा के बजाय कटघरे में खड़े हैं। कर्नाटक के मंत्री एच हलप्पा को भी जब बलात्कार के मामले में मंत्री पद गंवाना पड़ा तो उन्हें समझ में आ गया होगा कि कानून के हाथ मंत्री की गरदन तक भी पहुंच सकते हैं।
कर्नाटक के भूमि घोटाले में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा की कुर्सी जाते-जाते बची, लेकिन उन्हें भी तंत्र की ताकत का अहसास तो हो ही गया। अंतत: उनके रिश्तेदारों को भूमि वापस लौटानी पड़ी और राज्य के सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्री के. सुब्रमण्यम नायडू को अपनी कुर्सी की बलि देनी पड़ी।
पूर्व संचार मंत्री ए राजा को कुछ समय पहले तक सत्ता के गलियारों में वाकई राजा का ही दर्जा हासिल था। उनकी राजशाही इसलिए भी चल रही थी कि उनकी पार्टी द्रमुक को नाराज करने की हिम्मत प्रधानमंत्री भी नहीं जुटा पाते थे। इसालिए जब टू जी स्पेक्ट्रम मामले में उनके खिलाफ नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट आई, तो भी राजा 1.76 लाख करोड़ रुपए के इस कथित घोटाले के आरोप से बेपरवाह दिख रहे थे। उनकी बेपरवाही देखकर लोगों का यह कहना स्वाभाविक ही था कि कुछ लोग तंत्र से ऊपर हैं। पर इसी तंत्र ने राजा का राजपाट छीन लिया और अब वे एक अभियुक्त की तरह सफाई देते फिर रहे हैं। खुद राजा ही नहीं उनकी मदद करने वाले पत्रकार तक सफाई देने को मजबूर हैं।
मुंबई में आदर्श हाउसिंग सोसायटी का घोटाला उजागर हुआ, तो लोगों ने कहा कि इस देश में कानून कायदा भी ‘आदर्श’ शब्द की तरह लुप्त हो चुका है। हर आदमी को यही आशंका थी कि इसमें इतने बड़े-बड़े नाम शामिल हैं कि कानून इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा, पर कानून का डंडा ऐसा घूमा कि न सिर्फ मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण सहित कई लोगों की कुर्सी गई, बल्कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इस अवैध इमारत को गिराने तक की सिफारिश कर दी।
मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के मलिकपुर गांव से एक ऐसी खबर मिली, जो हमारे संविधान की मूलभावना को ही चिढ़ाती है। खबर थी कि वहां एक कुत्ते के मालिक ने दलित के घर की रोटी खाने पर न सिर्फ कुत्ते को अछूत घोषित कर दिया, बल्कि हरजाने के तौर पर 15 हजार रुपए की मांग भी की। सवाल है कि जिस व्यवस्था में इतना अंधेर संभव हो, उसके रहने, न रहने में क्या फर्क है? पर इस खबर के उत्तरार्ध में एक ऐसी सूचना भी थी, जो न सिर्फ तंत्र में विश्वास जगाती है, बल्कि उसके होने के महत्व को भी रेखांकित करती है। वह सूचना यह थी कि जन सुनवाई में जिला कलेक्टर ने न सिर्फ दलित परिवार को सुरक्षा उपलब्ध कराने का आदेश दिया, बल्कि कुत्ते के मालिक के खिलाफ दलित उत्पीड़न कानून के तहत मुकदमा दर्ज कराने का आदेश भी दिया।
इन उदाहरणों से यह नहीं समझ लेना चाहिए कि हमारा तंत्र बिल्कुल दुरुस्त है। अभी भी इसके समक्ष अनेक अविश्वसनीय चुनौतियां हैं। क्या आप इस बात पर भरोसा कर सकते हैं कि देश का आईटी हब कहे जाने वाले बंगलुरु से मात्र 40 किलोमीटर दूर अणेकल नाम का एक तालुका है, जहां दलितों को किसी सवर्ण के घर में प्रवेश करने की इजाजत नहीं है। वे चुनाव लड़ तो सकते हैं, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान भी वे किसी गैरदलित के घर में नहीं घुस सकते। हाल के पंचायत चुनावों के दौरान वहां दलित प्रत्याशी सवर्ण घरों के दरवाजे के बाहर खड़े होकर ही वोट मांगते नजर आए। और उनके वोट मांगने का भी क्या मतलब? जो घर में प्रवेश की इजाजत तक नहीं देते, वे वोट क्यों देंगे? पर इसी तंत्र ने देश के सबसे बड़े राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर एक दलित महिला को आसीन होने का मौका दिया है।
सो हमें हर पल अपने तंत्र को कोसने के बजाय इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि इस छतरी के छेदों को कैसे बंद किया जाए, ताकि यह सबको समान रूप से सुरक्षा दे सके।
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