Sunday, January 16, 2011

सत्ता की सटीक कुंजी

लेखक चुनावी सफलता के लिए शासन के स्तर पर जरूरी सुधारों का उल्लेख कर रहे हैं…..

बिहार के चुनाव परिणाम ने विकास पर मुहर लगा दी है। इससे स्पष्ट रूप से संकेत मिलता है कि केवल सामाजिक इंजीनियरिंग सत्ता पाने की कुंजी नहीं है। नीतीश कुमार के नेतृत्व को मिला ऐतिहासिक जनादेश इस मूल सिद्धांत की भी पुष्टि करता है कि अपने वायदों को पूरा करें। सामान्य नागरिक या तथाकथित आम आदमी सरकार से आर्थिक विकास और मयार्दित जीवन की आस लगाए बैठा है। बिहार में अपने अधिकार का इस्तेमाल करके उसने इस दिशा में कदम आगे बढ़ा दिए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश भर के राजनेता मतदाताओं के फैसलों को प्रभावित करने के अपने तरीकों पर पुनर्विचार करेंगे। बड़ी संख्या में महिलाओं ने नीतीश कुमार के समर्थन में मतदान किया, क्योंकि आठवीं कक्षा में पहुंचते ही उनकी बेटी को साइकिल मिल रही है और हर माह उसके खाते में कुछ सौ रुपये पहुंच जाते हैं। यह लड़कियों के सशक्तीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। विश्वास करना कठिन हो जाता है कि बिहार की ग्रामीण सड़कों पर सैकड़ों की तादाद में लड़कियां साइकिल पर सवार होकर स्कूल जाती दिखती हैं। उत्तर प्रदेश के वर्तमान शासकों को मतदाताओं के मानस में होने वाले इस परिवर्तन से सावधान हो जाना चाहिए। एक समय था जब प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के साथ उत्तर प्रदेश अपेक्षाकृत समृद्ध राज्य था, लेकिन पिछले कुछ दशकों से इसने अपनी चमक खो दी है और विकास के मामले में फिसड्डी राज्य बन गया है। वर्तमान में इसकी प्रति व्यक्ति जीडीपी पूरे देश में सबसे कम है। आज इस राज्य में वे तमाम बुराइयां फैली हैं जो बिहार में नीतीश कुमार के सत्तारूढ़ होने से पहले थीं। अगर उत्तर प्रदेश के मतदाता भी बिहार की राह पकड़ते हैं, जो संभावित भी है तो आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता कि उत्तर प्रदेश में बसपा वापस सत्ता में लौट पाएगी। उत्तर प्रदेश में आर्थिक पुनरुत्थान के बिना उम्मीद नहीं की जा सकती कि भारत की जीडीपी दोहरे अंकों में पहुंच पाएगी। उत्तर प्रदेश में भारत की आबादी का छठा भाग रहता है। यह संख्या जर्मनी, फ्रांस और इंग्लैंड की कुल आबादी से भी अधिक है। उत्तर प्रदेश में व्यापक ढांचा मौजूद है, जिसका काफी हद तक दोहन भी किया गया, किंतु बाद में इसे तहस-नहस करके बर्बाद कर दिया गया। यहां विश्वविद्यालय, मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज, रेल, सड़क, नहरें, हवाई अड्डे और शहरी केंद्र मौजूद हैं। जरूरत है तो बस संवृद्धि लाने के लिए इनका पुनरुद्धार करने की। सबसे महत्वपूर्ण जनता में यह विश्वास पैदा करना है कि यह संभव है। इसके लिए शासक वर्गो को गंभीरता दिखानी होगी। सत्तारूढ़ दल के साथ-साथ उन लोगों का भी ध्यान आर्थिक विकास की समग्र योजना को फलीभूत करने पर होना चाहिए, जो सत्ता का निर्धारण करते हैं। शासक वर्ग को रोजगार के अवसर बढ़ाने और लोगों के जीवन, स्वतंत्रता व संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर देना चाहिए। सरकार को स्पष्ट रूप से जिम्मेदारियां निर्धारित कर देनी चाहिए। जिम्मेदारियों के इस निर्धारण में अपेक्षित परिणाम के लिए संबंधित अधिकारियों की पूरी जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। वरीयता के पांच क्षेत्र चिह्नित करें। इनमें से कुछ का सीधा-सीधा असर पड़ना चाहिए, जिससे आम आदमी राहत महसूस करें। इस प्रकार के क्षेत्र अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होते हैं। हालांकि सकल परिणाम के लिए वरीयता उन क्षेत्रों को देनी चाहिए, जो औसत नागरिकों को प्रभावित करते हैं। उत्तर प्रदेश में पांच वरीयता क्षेत्रों का निर्धारण इस प्रकार हो सकता है। सर्वप्रथम, जीवन और संपत्ति की सुरक्षा। लंबे समय से व्यक्ति और संपत्ति की सुरक्षा को लेकर प्रदेश आश्वस्त नहीं है। सत्तारूढ़ दल के लोगों की दबंगई के कारण लोगों का जीना मुहाल हो गया है। किसी भी व्यक्ति को कमाई और अर्जित संपत्ति को अपनी मर्जी से इस्तेमाल का मौका मिलना चाहिए। इससे लोग उद्यमिता के लिए प्रोत्साहित होंगे, जिससे अंतत: आर्थिक विकास को गति मिलेगी। दूसरा वरीयता क्षेत्र हो सकता है विद्युत के उत्पादन और वितरण में सुधार। बिजली मूल आवश्यकता बन चुकी है। यह जीवन को आरामदायक बनाती है और शारीरिक दबाव कम करके उत्पादकता बढ़ाती है। देश के अधिकांश राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी बिजली उत्पादन कम है। संप्रेषण और वितरण की हानि से हालात बदतर हो गए हैं। इसलिए विद्युत उत्पादन बढ़ाने, अन्य राज्यों से बिजली खरीदने और वितरण व्यवस्था को दुरुस्त करने से उत्साह, विश्वास और खुशी का माहौल विकसित होगा। पावर कट के बाद बिजली आने पर लोगों के चेहरे पर चमकने वाली मुस्कान इसकी महत्ता स्पष्ट कर देती है। तीसरा वरीयता क्षेत्र स्कूल और कॉलेज हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं। एक समय था, जब इनमें से कुछ की ख्याति पूरे देश में थी। दुर्भाग्य से, आज प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई है। इसी कारण बड़ी संख्या में प्रदेश के छात्रों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी समुचित रोजगार नहीं मिल पाता है। आज गरीब से गरीब व्यक्ति भी चाहता है कि उसके बच्चे पढ़-लिख कर काबिल बनें और आर्थिक समृद्धि की सीढ़ी पर चढ़ें। बेहतर शिक्षा के अभाव की कुंठा उत्तर प्रदेश के लोगों के चेहरे पर साफ झलकती है। शैक्षिक व्यवस्था में हल्के से सुधार के भी संयोजित और एकीकृत प्रयास शासन प्रणाली में लोगों का विश्वास कायम करेंगे। इसके अलावा, बाजार में आवश्यक वस्तुओं की पर्याप्त आपूर्ति भी सरकार की वरीयता सूची में होनी चाहिए। इनमें खाद्यान्न, सब्जियां और दूध आदि की आपूर्ति पर विशेष बल होना चाहिए। इन वस्तुओं की उत्तर प्रदेश में नितांत कमी है। खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता और इनके ऊंचे दाम लोगों की गंभीर समस्या बन चुके हैं। जमाखोरी, मिलावट और अधिक दाम वसूल कर व्यापारी अंधा मुनाफा कमा रहे हैं। इन पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। पांचवां वरीयता क्षेत्र है-आम आदमी की आवश्यकताओं-चिंताओं का ध्यान रखना। आम आदमी को महसूस होना चाहिए कि वह भी समाज का अभिन्न अंग है और उसे सुखी बनाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। यह काम सरकारी मशीनरी और नौकरशाही को चुस्त-दुरुस्त बनाकर किया जा सकता है। लोगों की सरकार तक पहुंच होनी चाहिए। इन जनहितकारी कार्यो से जनप्रतिनिधियों को भी लाभ होगा। अगर वे ऐसा करते हैं तो उनकी सत्ता में वापसी की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। अगर वे ऐसा नहीं करते तो यह भविष्यवाणी करने के लिए किसी भविष्यवक्ता की आवश्यकता नहीं पड़ेगी कि वे राजनीतिक गुमनामी में खो जाएंगे। (लेखक सेबी के पूर्व अध्यक्ष हैं)


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