Saturday, January 15, 2011

सूचना आयुक्तों की ढिलाई से 86 करोड़ का नुकसान

देश भर के सूचना आयुक्तों ने अगर सूचना के अधिकार (आरटीआइ) कानून का पालन करते हुए सरकारी अफसरों पर जुर्माना लगाया होता तो सरकारी खजाने में सिर्फ एक साल में 86 करोड़ की मोटी रकम जुड़ गई होती। यह नतीजा 27 राज्यों की 13 साझा पीठ और 89 सूचना आयुक्तों के 76,816 फैसलों के आधार पर निकाला गया है। पब्लिक काज रिसर्च फाउंडेशन (पीसीआरएफ) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने ये आंकड़े पेश करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि सूचना आयुक्त अपने काम के तरीके की गंभीरता से समीक्षा करें और अपने नजरिए को बदलें। यह आकलन वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान किए गए आयोगों के फैसलों के आधार पर किया गया है। इन्होंने बताया कि यह 86 करोड़ का जुर्माना सरकारी अधिकारियों पर सिर्फ सूचना में देरी की वजह से लगाया जाना चाहिए था, जबकि इसके अलावा सूचना के अधिकार कानून में ही सात और कारण बताए गए हैं, जिनकी वजह से सरकारी अधिकारियों पर नकद जुर्माना लगाया जाना चाहिए। ताजा अध्ययन में केंद्रीय सूचना आयोग के आयुक्त ओमिता पॉल, दीपक संधु और सुषमा सिंह सहित 26 आयुक्तों के नाम दर्ज हैं, जिन्होंने एक भी मामले में कोई जुर्माना लगाना ठीक नहीं समझा। पॉल की लापरवाही की वजह से 13 लाख का नुकसान हुआ, जबकि संधु की वजह से 12.5 लाख का और सिंह की वजह से 47.5 लाख रुपये का। जुर्माना लगाने के मामले में सबसे तत्परता दिखाने वाले आयुक्तों में मणिपुर के आरकेएन. सिंह सबसे ऊपर हैं। इन्होंने जिन मामलों में जुर्माना लगाया जाना चाहिए था, उनमें से 32 फीसदी पर यह कार्रवाई की। जबकि अरुणाचल प्रदेश के सूचना आयुक्त बी. डेंगन ने 31 फीसदी मामलों में यह तत्परता दिखाई। पीसीआरएफ की रिपोर्ट में महाराष्ट्र के सूचना आयुक्त नवीन कुमार को सूचना मुहैया न करवाने के लिए जवाबदेह आयुक्तों की सूची में सबसे ऊपर रखा गया है।

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