सूचना अधिकार (आरटीआई) के जरिये से आ रही जानकारियों की वजह से शीर्ष नेतृत्वधारी हों, या नौकरशाह सबके लिए मुश्किल खड़ी हो रही है। आरटीआई के माध्यम से मिली कई जानकारियों ने सुर्खियां बटोरी हैं। कई बड़े घोटालों का पर्दाफाश इसकी वजह से हुआ। यह कानून नहीं होता तो वे घोटाले कभी सामने नहीं आ पाते। इसी कारण से इस जनाधिकार को निस्तेज करने की कोशिश चल रही है। सरकार कोशिशों में कामयाब हो गई तो यह आरटीआई कानून वर्तमान रूप में नहीं रहेगा। आम लोगों के लिए सूचना पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा। इस तरह के किसी बदलाव (जो जनता के हक में नहीं हैं) के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाने की जरूरत है। जरूरत यह भी है कि नागरिक समाज जागरूक हो और इस सम्बंध में सरकार की मंशा के विरोध में आवाज उठाये। हमें जानना होगा कि आरटीआई को विकलांग बनाने की कोशिश की जा रही है। प्रस्तावित संशोधनों के लागू होते ही सरकार से सूचना लेना कठिन व महंगा हो जाएगा। सरकार आरटीआई के कायापलट के लिए गम्भीर है। इसके तहत ढाई सौ शब्दों से अधिक के सवाल स्वीकारे नहीं जाएंगे और एक अर्जी में एक से अधिक सवाल नहीं पूछा जा सकेगा। जवाब देने में डाक खर्च 10 रुपये से ज्यादा आएगा तो उसे आवेदनकर्ता को उठाना होगा। नये फॉरमेट में आवेदनकर्ताओं को संक्षिप्त में अपने सवाल पूछने के लिए भाषा का पाठ पहले पढ़ना होगा। ढाई सौ शब्दों की सीमा किसी तरह से ठीक नहीं है। द नेशनल कैम्पेन फॉर पीपुल्स राइट टू इन्फॉरमेशन (एनसीपीआरआई) ने पिछले महीने आरटीआई पर काम करने वालों के साथ इस मुद्दे पर र्चचा डुई थी। कुछ बिन्दुओं पर सभी की एकराय बनी। आरटीआई कानून में जो संशोधन प्रस्तावित किया गया है, उनको देखकर पता चलता है कि इसमें जनता की आवाज और राय को पूरी तरह अनसुना कर दिया गया है। नियम की बात करें तो किसी संशोधन से पहले सार्वजनिक रूप से जनता के साथ व्यापक परामर्श होना चाहिए। जहां जन-राय और सुझाव की उपेक्षा की जाती है, उसका कारण जनता के बीच अवश्य रखा जाना चाहिए। ऐसा नहीं किया जाता तो यह आरटीआई कानून के धारा 4 (1) (डी) का उल्लंघन माना जाएगा। दूसरी बात सूचना आयुक्त को इस बात की आजादी होनी चाहिए कि वह अपने साथ काम करने वालों का चुनाव स्वयं करे और किसके हिस्से क्या काम होगा, यह भी वह स्वयं ही तय करे। हमारा मानना है कि एक विषय और ढाई सौ शब्दों की सीमा व्यावहारिक नहीं है। इसे खत्म होना चाहिए। सूचना के साथ शुल्क की जो वृद्धि प्रस्तावित है, वह सूचना मांगने वालों को हतोत्साहित करेगी। किसी भी प्रारूप को अनिवार्य नहीं बल्कि सांकेतिक ही रखना ठीक होगा। किसी अपील को सिर्फ सांकेतिक रूप से पूरा न होने की दशा में, इस आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। आवेदन पत्र के साथ लगे हुए दस्तावेज में स्वयं सत्यापित और अभिप्रमाणित नहीं है, या कोई दस्तावेज आवेदन के साथ नहीं है तो इसे अर्जी खारिज करने का आधार नहीं माना जाना चाहिए। आवेदनकर्ता को किसी विवाद की स्थिति में मौका अवश्य मिले कि वह दस्तावेज सत्यापित करवा कर लाए अथवा उसके दस्तावेज पूरे नहीं हैं, तो उसे पूरा करे। आवेदक को आवेदन वापस लेने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। आवेदन सिर्फ आवेदनकर्ता की मृत्यु की स्थिति में ही समाप्त समझा जाना चाहिए। आयोग को अपना फैसला खुली अदालत में सुनाना चाहिए। सरकार यदि आरटीआई कानून को जीवित रखना चाहती है, तो उसे नियमों में पारदर्शिता लानी होगी। जो प्रस्तावित नियम हैं, वे आरटीआई के मूलभावना को आहत करते हैं। आज जिस देश में एक तिहाई आबादी लिख और पढ़ नहीं सकती, वहां इस तरह के कानून आने का मतलब, सरकार का इरादा इनकी मदद करना नहीं है बल्कि वह सूचना अधिकार के राह में बाधा डालना चाहती है।
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