लेखक सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भूमि अधिग्रहण और मुआवजे के कानूनी पहलुओं पर निगाह डाल रहे हैं...
राज्य द्वारा निजी भूमि का अधिग्रहण किए जाने एवं उस पर दिए जाने वाले मुआवजे को लेकर पिछले कुछ वर्षो में किसानों द्वारा कई आंदोलन किए गए हैं। अभी भट्टा-पारसौल पर पूरे देश की नजर है, जहां इसी मुद्दे पर वहां के निवासी आंदोलित हैं। समस्या नई नहीं है और इस कारण ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इसे समझने की जरूरत है। सरकार विकास के लिए निजी जमीन का अधिग्रहण करती रही है। दरअसल, सर्वोच्च कार्यक्षेत्र (एमिनेंट डोमेन) की शक्ति संप्रभुता का अटूट हिस्सा है। इसका तात्पर्य है कि सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए राज्य को निजी संपत्ति के अधिग्रहण का कानूनी अधिकार है। ये शब्द पहली बार ह्यूगो ग्रोटियस ने 1925 में इस्तेमाल किए थे, किंतु उसके भी पहले 1883 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने यूनाइटेड स्टेट्स वनाम जोंस में निर्णय दिया कि चूंकि यह संप्रभुता का अभिन्न अंग है, इसलिए सरकार को इस शक्ति को अलग से देने की जरूरत नहीं है। भारतीय उच्चतम न्यायालय ने भी कामेश्वर सिंह वनाम बिहार में कहा कि हालांकि इस शक्ति की मान्यता है, लेकिन संवैधानिक प्रावधान वे सीमा निर्धारित करते हैं जिनके अंदर उसका इस्तेमाल होना है। कूले ने अपनी पुस्तक कांस्टीट्यूशनल लिमिटेशंस में लिखा है कि अमेरिका में तीन सीमाएं हैं। एक, अधिग्रहण के लिए कोई वैध कानून होना चाहिए। दो, अधिग्रहण सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए होना चाहिए तथा तीन, उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 31 के अंतर्गत संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया गया था। इसमें स्पष्ट कहा गया कि किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से बिना कानूनी प्रावधान के बेदखल नहीं किया जाएगा, यह केवल सार्वजनिक उद्देश्य के लिए होगा और इसके लिए मुआवजा दिया जाएगा। मुआवजे के मुद्दे पर अनुच्छेद 31 को 6 बार संशोधित किया गया तथा अंतिम बार 44वें संविधान संशोधन में संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया गया। इस प्रकार, अनुच्छेद 31 समाप्त कर दिया गया और उसकी जगह अनुच्छेद 300-ए जोड़ दिया गया। जब उच्चतम न्यायालय ने बेला बनर्जी वनाम पश्चिम बंगाल मामले में निर्णय दिया कि मुआवजे का अर्थ है अधिग्रहीत संपत्ति की सही कीमत तो संसद ने चौथे संविधान संशोधन अधिनियम, 1954 के द्वारा प्रावधान कर दिया कि किसी कानून को इस आधार पर किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी कि मुआवजा पर्याप्त नहीं है। इस तरह उच्चतम न्यायालय के निर्णय को निष्प्रभावी कर दिया गया। चौथे संशोधन ने संपत्ति के अधिग्रहण करने के राज्य के अधिकार को स्पष्ट रूप से दोहराया। साथ ही अनुच्छेद 31 ए की परिधि को बढ़ाकर आवश्यक जनकल्याण के कानून भी उसके अंदर समेट लिए गए। 17वें संविधान संशोधन ने संपत्ति के मौलिक अधिकार में और कटौती कर दी। हम पाते हैं कि अधिकतर मामलों में अदालत एवं संसद के बीच टकराव संपत्ति के अधिकार के इर्द-गिर्द घूमता रहा। जब अदालत ने मुआवजा की व्याख्या पर जोर दिया तो संसद ने 25वें संविधान संशोधन, 1971 के जरिए उसकी जगह राशि शब्द कर दिया। नेहरू के कार्यकाल में 17 संशोधन किए गए और उनमें सर्वाधिक विवादास्पद वे थे जिनमें संपत्ति के अधिकार के संदर्भ में न्यायिक समीक्षा के दायरे को काफी कम कर दिया गया। स्वाभाविक है कि धनाढ्य वर्ग इससे चिंतित हुआ। मुद्दा यह था कि क्या संसद अपने संशोधन के अधिकार का प्रयोग कर संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार को छीन सकती है। अनुच्छेद 13 (2) के अनुसार राज्य वैसा कोई कानून नहीं बनाएगा जो मौलिक अधिकारों में कटौती करता है। संविधान संशोधन को कानून की श्रेणी में नहीं रखा गया है। 1967 में एक ऐतिहासिक फैसले में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि अनुच्छेद 368 के तहत किया जाने वाला संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 (2) के अंतर्गत कानून की श्रेणी में आता है। इसलिए संसद मौलिक अधिकरों में कोई कटौती नहीं कर सकती है। इस निर्णय से पहले किए गए संविधान संशोधन भी निरस्त हो जाते, परंतु मुख्य न्यायाधीश सुब्बा राव ने यह व्यवस्था दी कि यह निर्णय भविष्य में किए जाने वाले संशोधनों पर लागू होगा। अभी जो आंदोलन हो रहे हैं उसकी वजह यह है कि मुआवजा निर्धारित करने का कोई निश्चित एवं वैज्ञानिक तरीका नहीं निर्धारित किया गया है और सार्वजनिक उद्देश्य की परिभाषा भी ऐसी है जिससे काफी समस्याएं पैदा हो रही हैं। (लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं)
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