धनबाद सरकार ने भले ही लावारिस शव को धार्मिक रीतिरिवाज के अनुसार अंतिम संस्कार करने का एलान कर रखा है, लेकिन मटकुरिया श्मशान घाट में कचरे के ढेर में इन्हें दफन कर दिया जाता है। चाहे वो किसी समुदाय का हो, कचरे में ही दफन होना उसकी नसीब है। थोड़ा सा कचरा खोदा, लाश छिपाई और काम खत्म। यह है सरकारी अंतिम संस्कार की हकीकत। यह हाल है धनबाद के मटकुरिया श्मशान घाट का। दुर्गध के सहारे आप स्वत: वहां पहुंच जाएंगे। कचरे का अंबार, लाश को नोच कर अपना पेट भरने वाले कुत्तों की भीड़ और शव को नोचने वाली पक्षियों का झुंड। इधर-उधर फेंके पड़े मानव कंकाल। आपको सरकारी अंतिम संस्कार की सच्चाई बता देगी। दैनिक जागरण की टीम ने वहां एक शव को ऐसे ही हाल में पाया। कचरे में पड़े शव की हड्डियों में कहीं-कहीं अब भी मांस मौजूद था। खोपड़ी कुछ दूरी पर थी और कंकाल कुछ दूरी पर। थोड़ी दूरी पर कुत्ते पेट भर कर सुस्ता रहे थे। न कफन था और न ही दफन। अंतिम संस्कार को सिर्फ 300 रुपये : वैसे तो किसी भी धर्म के मुताबिक अंतिम संस्कार कराने में कम से कम तीन हजार रुपया लग जाते हैं,लेकिन सरकारी अंतिम संस्कार के लिए सिर्फ 300 रुपये का ही प्रावधान है। किसी भी पुलिस अधिकारी को अंतिम संस्कार कराने के लिये राशि प्रशासन की ओर से तीन सौ रुपये ही मुहैया कराई जाती है। ये रकम पिछले दशक से ही पत्थर की लकीर की तरह एक जगह पर टिकी है। पुलिस भी क्या करे : लावारिस शवों के अंतिम संस्कार कराने के मामले में पुलिस की बेचारगी भी कम नहीं है। लावारिस की मौत के बाद से लेकर अंतिम संस्कार तक पुलिस को काफी कुछ झेलना पड़ता है। अस्पताल या मौके-ए-वारदात से पुलिस को पोस्टमार्टम हाउस तक लाश पहुंचाने के लिये या तो किसी भाड़े वाली गाड़ी को डंडा दिखाना पड़ता है या फिर अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है। पोस्टमार्टम में दक्षिणा भी तय है। पोस्टमार्टम हाउस से लाश को फिर वाहन से श्मशान घाट तक लाने का खर्च। इसके बाद कब्र खोदने और दफन करने वालों को भी रकम देनी पड़ती है। ऐसे में बगैर किसी संस्कार के भी पुलिस की जेब से एक हजार रुपये तक निकल जाते हैं। शव के अंतिम संस्कार के बाद पुलिस एसडीओ कार्यालय में एक आवेदन लिख कर देते हैं, इसके बाद तीन सौ रुपये मुहैया कराये जाते हैं।
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