Tuesday, June 14, 2011

संपत्ति का अधिकार भी कोई चीज है


करीब तीन साल पहले जेल बनाने के लिए भूमि अधिग्रहण की सरकारी अधिसूचना निकलती है और उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में देवशरण जैसे कई किसानों को भूमिहीन बना देती है। उसी साल ग्रेटर नोएडा में औद्योगिक विकास के लिए दनकौर तहसील के मकौड़ा गांव में भूमि अधिग्रहण की दूसरी अधिसूचना राधेश्याम का तीस साल पुराना मकान लील लेती है। कोई अपील-दलील नहीं, क्योंकि अधिग्रहण जनहित के लिए था और सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून केआपात अधिकार का इस्तेमाल किया था। ये मामले सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। सबसे बड़ी अदालत ने अधिग्रहण निरस्त कर दिए और आपात उपबंध के संदर्भ में सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि संपत्ति के अधिकार को इस तरह नहीं छीना जा सकता। भूमि अधिग्रहण के कई मामले जनहित बनाम संपत्ति के निजी अधिकार की बहस में उलझे हैं। नया अधिग्रहण कानून बनाने में जुटी सरकार के लिए अदालतों का बदलता नजरिया खासा अहम है। शाहजहांपुर में जेल के लिए जमीन अधिग्रहण को रद करते हुए अदालत ने अधिग्रहण के 117 साल पुराने कानून पर भी टिप्पणियां कीं। अदालत ने कहा कि ब्रिटिश काल का यह कानून, संविधान लागू होने से पहले का है। इसमें राज्य सरकार को मिली शक्तियों से आम लोगों के संपत्ति अधिकार प्रभावित होते हैं। हालांकि संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है और यह राज्य की कृपा से ही मिलता है, लेकिन यह मानना पड़ेगा कि संपत्ति पर कुछ अधिकार दिए बगैर बाकी के अधिकार बेमानी (छलावा) हो जाते है। संविधान के अनुच्छेद 13 के मुताबिक, इसके लागू होने के पहले का कोई भी कानून मौलिक अधिकार के खिलाफ नहीं हो सकता। अदालत का यह फैसला इसी साल मार्च का है। यह अधिग्रहण को लेकर सरकार के आपात अधिकार पर कानूनी नजरिया बदलने का पुख्ता प्रमाण है। इसी वजह से सरकारें अधिग्रहण के बाद अदालतों में मुकदमे हार रही हैं। कुछ ताजा फैसलों का निष्कर्ष है कि अदालत आपात स्थिति में लोगों की आपत्तियां सुने बगैर अधिग्रहण के सरकार के अधिकार को तो मानती है, लेकिन यह कहती है आपात स्थिति जमीनी तौर पर दिखनी चाहिए। खासतौर पर औद्योगिक विकास के लिए आपात उपबंध के तहत जमीन अधिग्रहण पर अदालत काफी सख्त दिखी है। मकौड़ा गांव की जमीन सरकार ने इसी मकसद से अधिग्रहीत की थी, लेकिन कोर्ट ने कहा यह अधिग्रहण वास्तव में निजी हितों के लिए है। अधिग्रहीत भूमि पर सरकार या उसकी कोई एजेंसी उद्योग नहीं लगाना चाहती, बल्कि निजी निवेश और क्षेत्र के लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को निर्देश दिया है कि जनहित के नाम पर अधिग्रहण की बारीकी से जांच हो और अदालतें सामाजिक और आर्थिक न्याय के सिद्धांत का ध्यान रखें। पश्चिम बंगाल बनाम प्रफुल्ल चूरन ला के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने किसी व्यक्ति की संपत्ति छिनने पर उसके आपत्ति दर्ज करने के अधिकार को जनहित से ऊपर माना है। कोर्ट ने कहा कि औद्योगिक एवं रिहायशी विकास की सभी योजनाएं देश की उत्पादन क्षमता बढ़ाने और आश्रय देने के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन ये इतनी आकस्मिक नहीं हो सकती कि अधिग्रहण के खिलाफ कानून में आपत्ति दर्ज कराने की संक्षिप्त प्रक्रिया समाप्त कर दी जाए।

भूमि अधिग्रहण कानून, 1894 की धारा 17 आपात स्थिति में सरकार को विशेष अधिकार देती है
आपात स्थिति में सरकार जनहित के नाम पर अधिग्रहण के लिए अधिसूचित भूमि को कब्जे में लेने का आदेश दे सकती है। कब्जे के बाद जमीन सरकार में निहित मानी जाएगी
इसकी उपधारा 2 में आपात स्थिति भी बताई गई है। जैसे नदी का अचानक धारा बदल लेना। प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए, रेलवे लाइन, सड़क, बिजली, पानी, ड्रेनेज, सिंचाई, यातायात या इसी तरह की आपात स्थिति में भूमि अधिग्रहण प्रस्ताव की अधिसूचना (धारा-4) के तुरंत बाद कलेक्टर जमीन पर कब्जा ले सकता है। अधिग्रहीत जमीन पर कोई निर्माण या घर है तो कब्जा लेने के कम कम 48 घंटे पहले भू स्वामी को नोटिस देना होगा
उपधारा 3 कहती है कि कब्जा लेते समय कलेक्टर मुआवजा राशि भी देगा, जिसमें भूमि पर खड़ी फसल या अचानक हटने से हुए अन्य नुकसान की भी भरपाई की जाएगी
उपधारा 4 सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कहा गया है कि आपात स्थिति में अधिग्रहीत भूमि के मामले में आपत्ति उठाने के उपबंध यानी धारा 5ए के प्रावधान लागू नहीं होंगे



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