लेखक शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में ठेकेदारी प्रथा के योजना आयोग के सुझाव से असहमति जता रहे हैं……
योजना आयोग ने सुझाव दिया है कि सरकारी शिक्षा, स्वास्थ्य एवं दूसरी कल्याणकारी योजनाओं को निजी ठेकेदारों के माध्यम से वैसे ही चलाना चाहिए जैसे पीडब्लूडी द्वारा ठेकेदारों से सड़कें बनवाई जाती हैं। सोच सही दिशा में है। सरकारी कल्याणकारी तंत्र असफल है। इसमें सुधार करना कठिन है। ठेकेदार द्वारा सही सुविधाएं उपलब्ध न कराने पर जनता सरकारी अधिकारी से गुहार लगा सकेगी। सरकार, ठेकेदार एवं जनता के बीच त्रिकोणीय घर्षण से व्यवस्था में सुधार आएगा। वर्तमान में सरकार और जनता के बीच सीधा सामना होता है। शिक्षक ड्यूटी पर न उपस्थित हो तो उसी जिला शिक्षाधिकारी से शिकायत करनी पड़ती है जिसकी मिलीभगत से शिक्षक अनुपस्थित रहता है। ठेकेदारी प्रथा से सुधार होगा, जैसे कोलकाता और दिल्ली में बिजली वितरण को ठेकेदारों को देने से सुधार आया है। फिर भी ठेकेदारों के माध्यम से समस्या का मौलिक समाधान नहीं होता है। इस विषय पर योजना आयोग द्वारा गठित उपसमूह की रपट में कहा गया है कि सामाजिक सेवाओं की घटिया स्थिति का कारण एकाधिकार है। सरकारी सुविधाओं का विकल्प उपलब्ध न होने के कारण जनता को मजबूरन सरकारी तंत्र से सुविधाएं लेनी पड़ती हैं। इससे सरकारी कर्मियों में अकर्मण्यता, अक्खड़पन और भ्रष्टाचार पनपता है। इसलिए विषय सरकारी बनाम निजी सुविधाओं का नहीं है, बल्कि विषय प्रशासनिक सुधार का है। इस उद्धरण से स्पष्ट होता है कि मूल समस्या एकाधिकार की है। नुक्कड़ पर केवल एक ही रिक्शा उपलब्ध हो तो यात्री को रिक्शा चालक की मनमानी बर्दाश्त करनी पड़ती है। इसी प्रकार सरकारी डाक्टरों एवं टीचरों के आगे जनता बेहाल है। ऊपर दिए गए उद्धरण में ठेकेदारी व्यवस्था को प्रशासनिक सुधार बताने का अर्थ है कि एकाधिकार की मूल समस्या ज्यों की त्यों बनी रहेगी। गांव में स्कूल सरकारी कर्मचारी चलाएं या ठेकदार के कर्मचारी चलाएं, दोनों ही स्थिति में अध्यापक का एकाधिकार बना रहता है। ठेकेदार द्वारा नियुक्त अध्यापक उतने ही अकर्मण्य हो सकते हैं जितने सरकारी अध्यापक हैं। अंतर सिर्फ इतना पड़ता है कि सरकारी कर्मियों की अकर्मण्यता पर अनुशासनात्मक कार्यवाही करना कठिन होता है, जबकि ठेकेदार द्वारा सख्ती की जा सकती है। अत: ठेकेदारी प्रथा से एकाधिकार की मौलिक समस्या का समाधान नहीं होता है। योजना आयोग का कहना है कि ठेकेदारी प्रथा में ठेकेदारों के बीच प्रतिस्पर्धा से कार्य की गुणवत्ता में सुधार आएगा। इस सुधार के हासिल होने की संभावना है, परंतु संदेह भी है। मेरा अनुभव है कि कई क्षेत्रों में सरकारी कामकाज की गुणवत्ता ठेकेदारों से उत्तम होती है। बीमा एजेंट बताते हैं कि सरकारी बीमा कंपनियों से क्लेम पूरा मिल जाता है यद्यपि समय ज्यादा लगता है। निजी कंपनियां क्लेम में अनुचित कटौती करती हैं। सरकारी टेलीफोन कंपनी के बिल सही आते हैं, जबकि निजी कंपनियों के बिलों में घपले की शिकायत ज्यादा मिलती है। सरकारी अध्यापकों की नियुक्ति सही योग्यता होने पर ही होती है। निजी ठेकेदारों द्वारा कम योग्यता वालों की नियुक्ति की जा सकती है। सरकार एवं ठेकेदार, दोनों के अलग-अलग गुण-दोष हैं। सरकारी तंत्र में वेतन, योग्यता आदि उत्तम होते हैं, जबकि प्रशासन ढीला होता है। इसके विपरीत ठेकेदारी व्यवस्था में वेतन, योग्यता आदि कमजोर होते हैं, किंतु प्रशासन चुस्त होता है। इस प्लस-माइनस में अंतिम परिणाम कुछ भी हो सकता है। ठेकेदारों का उत्तम होना जरूरी नहीं है। आयोग का कहना है कि ठेकेदारों पर निगरानी रखी जा सकती है और उनका मूल्यांकन किया जा सकता है। स्वतंत्र नियामक एजेंसी भी बनाई जा सकती है। बात सही है, परंतु ऐसा ही सरकारी तंत्र के लिए भी किया जा सकता है। मूल्यांकन करने के लिए ठेकेदारी लागू करना जरूरी नहीं है। यह देखा जाता है कि निजी व्यापारी सरकारी नियंत्रक को खरीद लेते हैं। निजी ठेकेदारों द्वारा नियामक एजेंसी को घूस देकर घटिया माल पास करा लिया जाता है, जैसा कि राष्ट्रमंडल खेलों के लिए बनाए गए पैदल पुल के ढहने से संकेत मिलते हैं। इन समस्याओं का हल ठेकेदारी से नहीं निकलता है। सरकारी तंत्र द्वारा सीधे सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं अथवा ठेकेदार के माध्यम से, इसमें ज्यादा अंतर नहीं पड़ता है, क्योंकि मूल जिम्मेदारी सरकार की ही होती है। मेरी समझ से सरकार के भ्रष्टाचार को ठेकेदारी के भ्रष्टाचार में बदलने से समस्या का हल नहीं निकलेगा, यद्यपि कभी-कभी यह सफल भी हो सकता है। इस दिशा में चलने से भटकाव एवं नुकसान है। बच्चे को गणित में रुचि न हो और वह स्पोर्ट्स में कॅरियर बनाना चाहता हो तो उसे गणित के ट्यूटर के पास गणित पढ़ने के लिए भेजना ठीक होते हुए भी हानिप्रद होता है। ट्यूटर के पास जाने से उसके गणित के नंबर में सुधार हो सकता है, परंतु स्पोर्ट्स की दिशा की सही संभावना को बंद करने में यह एक सहायक कदम हो जाता है। सचिन तेंदुलकर को यदि गणित के ट्यूटर के पास भेजा जाता तो वह संभवत: क्रिकेट में अव्वल स्थान नहीं पाते। मुरारी बापू को कांवेंट स्कूल में भेजा जाता तो वे कथावाचक नहीं बन पाते। शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था का सही समाधान है कि सरकारी हस्तक्षेप को ही समाप्त किया जाए। इस मद पर वर्तमान में सरकार द्वारा खर्च की जा रही रकम को जनता को सीधे नगद बाउचर देने चाहिए जिससे वे अपने मनपसंद स्कूल में बच्चों को भेज सकें। इस सही व्यवस्था को लागू करने के स्थान पर ठेकेदारी की ओर बढ़ना हानिप्रद है। विश्व बैंक के अनुसार भारत में स्वास्थ्य पर हो रहे कुल खर्च का मात्र 17 प्रतिशत सरकार द्वारा वहन किया जाता है। शिक्षा की भी कमोवेश यही परिस्थिति है। इस 17 प्रतिशत सरकारी खर्च पर सरकारी कल्याणकारी माफिया ने कब्जा कर लिया है। अत: जरूरत 83 प्रतिशत निजी खर्च की गुणवत्ता सुधारने की है, न कि 17 प्रतिशत सरकारी खर्च को ठेकेदारों को देने की। जरूरत इस माफिया राज को समाप्त करने की है। सरकार द्वारा सामाजिक क्षेत्र पर किए जा रहे खर्च को सीधे जनता को वितरित कर देना चाहिए। लोकतंत्र का मौलिक सिद्धांत है कि जनता समझदार है। इस राशि के खर्च को भी जनता के विवेक पर छोड़ देना चाहिए। जनता को मूर्ख बनाकर सरकारी तंत्र के माध्यम से घटिया स्वास्थ्य सेवाएं एवं घटिया शिक्षा जनता के सिर नहीं थोपना चाहिए। भारतवर्ष ऋषियों का देश रहा है, जो बिना सरकारी दखल के शिक्षित और स्वस्थ रहा है। यह आगे भी रह सकता है।
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