Wednesday, June 29, 2011

देश को असली नाम चाहिए


अगर आप से पूछा जाए कि आपके देश का नाम भारत है, इंडिया है या फिर हिंदुस्तान तो आप शायद निरुत्तर हो जाएंगे। देश के गृहमंत्रालय का हाल भी कुछ ऐसा ही है। उसे भी अपने देश का आधिकारिक नाम नहीं पता। सूचना के अधिकार (आरटीआइ) के माध्यम से यह सच्चाई सामने आई है। यह सवाल सबके सामने आने के बाद अब अपने देश को एक आधिकारिक नाम तो मिलना ही चाहिए। आरटीआइ कार्यकर्ता मनोरंजन रॉय ने इस बारे में जानकारी हासिल करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय में आरटीआइ आवेदन दिया था। मंत्रालय के अधिकारियों ने उन्हें जवाब दिया कि उनके पास इस बारे में कोई सूचना नहीं है। अंग्रेजी में देश को इंडिया, हिंदी में भारत और उर्दू में हिंदुस्तान कहा जाता है। रॉय ने बताया कि उन्होंने आरटीआइ में पूछा था कि अगर हमारे देश को कई नामों से बुलाया जाता है तो उसका असली नाम क्या है? लेकिन उन्हें जो जवाब मिला उसे देखकर वह दंग हैं और अब इस मामले को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि यदि एक आम आदमी अपना नाम बदलता है तो उसे कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसी तरह देश का नाम बदलने की जानकारी भी आम जनता को दी जानी चाहिए। रॉय ने कहा, हमारी सरकार को अपने देश का आधिकारिक नाम नहीं पता। इसलिए मैं अपने देश का नाम और राष्ट्रीय भाषा जानने के लिए जनहित याचिका दायर करूंगा।


टाटा की दलील, बिना बताए भूमि अधिग्रहण सही नहीं


हुगली की जिलाधिकारी श्रीप्रिया रंगराजन ने शुक्रवार को सिंगुर में टाटा मोटर्स से संबंधित डेढ़ पन्ने की रिपोर्ट कलकत्ता हाई कोर्ट को सौंप दी। इसमें टाटा मोटर्स के नैनो प्लांट में किसी भी तरह की चोरी से साफ इंकार किया है। टाटा मोटर्स ने बीते बुधवार को सिंगुर भूमि अधिग्रहण विधेयक के विरोध में अदालत में एक याचिका दायर की है। याचिका में विधेयक को असंवैधानिक करार देने के साथ प्लांट से कीमती सामान चोरी होने का आरोप लगाया है। इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने गुरुवार को चोरी के संबंध में जिला प्रशासन से शुक्रवार को रिपोर्ट तलब की थी। मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी। याचिका की सुनवाई कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायाधीश सौमित्र पाल की अदालत में शुक्रवार को तीसरे दिन भी जारी रही। हुगली की जिलाधिकारी श्रीप्रिया रंगराजन ने शुक्रवार को अदालत को डेढ़ पन्ने की रिपोर्ट सौंप दी। इसमें उन्होंने बताया है कि टाटा की जमीन को लेकर विवाद के बाद वहां एक अधिशासी अधिकारी नियुक्त किया गया था। 21 जून को नोटिस जारी करने के दिन वहां कोई घटना नहीं घटी। 22 23 जून को कुछ लोग बांस व टीन के टुकड़े ले जा रहे थे, जिन्हें गांव के लोग पकड़कर सिंगुर थाना ले गए और सारा सामान वापस ले लिया गया। कानून व्यवस्था में खामी को लेकर अभी तक उनके पास कोई शिकायत नहीं आई है। रिपोर्ट में जिलाधिकारी ने कहा है कि उन्होंने खुद परियोजना इलाके में प्रवेश कर वहां स्थित सभी सामानों की सूची तैयार की थी। सूची में दर्ज सभी सामान प्लांट में यथावत है। सूची उनके पास है। रिपोर्ट में नैनो प्लांट में चोरी की किसी भी घटना से साफ इंकार किया गया है। वहीं टाटा पक्ष के अधिवक्ता समरादित्य पाल ने कहा कि जमीन अधिग्रहण कानून के मुताबिक टाटा की जमीन को पब्लिक पर्पस व आक्शन के लिए देना होगा। जमीन अधिग्रहण मामले में केंद्रीय व राज्य सरकार के कानूनों में केंद्र का मान्य होता है, लेकिन इस मामले में राज्य सरकार के कानून को ही प्रधानता दी गई है। बार बार अनिच्छुक किसानों की जमीन वापस करने की बात कही जा रही है, जबकि संविधान में अनिच्छुक किसान जैसा कोई शब्द ही नहीं है। सिंगुर भूमि अधिग्रहण विधेयक पास होने के साथ ही अचानक कब्जे की नोटिस नहीं लगाई जा सकती है। संविधान के धारा 24 में इस बात का जिक्र नहीं है। जो बिल पास हुआ है, उसकी जानकारी कोर्ट को नहीं दी गई है। जिसकी जमीन है, उसे बिना बताए अधिग्रहण का नोटिस लगा दिया गया, जो सही नहीं है। इसके जवाब में राज्य के महाधिवक्ता अनिंद्य मित्रा ने कहा कि टाटा मोटर्स ने ड्ब्ल्यूबीआईडीसी (वेस्ट बेंगाल इंडस्टि्रयल डेवलपमेंट कारपोरेशन) को बिना बताए जमीन को 99 वर्ष के लीज पर ले लिया। इस लीज में वेंडरों को जमीन देने की बात नहीं कही गई है। वेंडरों को जमीन सरकार से नहीं बल्कि टाटा से मिलनी थी। अब विधानसभा में बिल पास होने के बाद यह जमीन टाटा मोटर्स की नहीं रही। टाटा ने यह जमीन नैनो गाड़ी बनाने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसके लिए पुर्जे इकट्ठा करने के लिए ली थी। जमीन का मालिकाना हक पाने के 32 महीने तक उस जमीन का कंपनी ने कोई इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने कहा कि जमीन अधिग्रहण कानून, 1894 के धारा 24 के मुताबिक टाटा मोटर्स जमीन की मालिक नहीं- अत: उसे मुआवजा देने का प्रश्न ही नहीं उठता। कोर्ट में सिंगुर अधिग्रहण संबंधी जो मामला चल रहा है, उसके एक अन्य आवेदक केदारनाथ यादव को भी इस मामले में हिस्सा लेने के लिए हाई कोर्ट ने अनुमति प्रदान कर दी है।


प्रशासक चुनने की सही राह


भारत में कलेक्टर को जो सम्मान हासिल है, वह प्रशासक बिरादरी को दुनिया में कहीं नहीं मिलता। यही सम्मान इस सेवा का सबसे बड़ा आकर्षण है। आज शिकायतें की जाती हैं कि प्रशासनिक सेवाओं में प्रतिभाएं नहीं आ रही हैं। बहरहाल वक्त बदल रहा है, अपेक्षाएं बदल रही हैं। वक्त की नजाकत कहती है कि प्रशासक को परिणामपरक होना है। सिर्फ शांति-व्यवस्था का पुराना जमाना गया। प्रशासक आज एक टीम का नेतृत्व करता है। सवाल है कि नेतृत्व क्षमता के गुणों का परीक्षण कैसे किया जाए। मात्र विश्वविद्यालयी विषयों की लिखित परीक्षा से प्रेरणा, क्षमता, दायित्वबोध, नेतृत्व आदि चारित्रिक गुणों का परीक्षण नहीं हो सकता। कोठारी कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार 70 के दशक के अंत में परीक्षा प्रणाली बदली गई एवं त्रिस्तरीय परीक्षा व्यवस्था लागू की गई। इस परीक्षा की सबसे बड़ी समस्या वैकल्पिक विषयों को लेकर रही है। प्रारंभिक परीक्षा को वैकल्पिक विषयों से मुक्त कर एक सार्थक परिवर्तन किया गया है। 12 जून को यह परीक्षा नए प्रारूप पर हुई है। मुख्य परीक्षा के लिए दो वैकल्पिक विषयों की व्यवस्था अभी भी है। अलग-अलग वैकल्पिक विषयों के प्राप्तांकों को समान सांख्यिकीय स्तर तक ले आना एक बड़ी समस्या है। इसके लिए स्केलिंग का फार्मूला बनाया गया, जो अकसर विवादों से घिरा रहता है। लोक प्रशासन, अर्थशास्त्र, भूगोल, पर्यावरण, विधि, समाजशास्त्र आदि ऐसे विषय हैं, जिनका सम्यक ज्ञान प्रशासक के लिए आवश्यक हो सकता है, लेकिन विभिन्न भाषाएं, साहित्य इस दिशा में क्या मदद देने वाले हैं, यह विचारणीय है। आप अनायास उन विषयों के विद्वान बन जाते हैं, जिनका सेवा में कभी भी उपयोग नहीं होगा। न जाने क्यों वैकल्पिक विषयों की इस अस्वाभाविक सी व्यवस्था पर कभी कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया गया! इसी प्रकार पुलिस, विदेश सेवाएं, कस्टम एक्साइज, लेखा सेवाएं विशेषज्ञता की अपेक्षा करती हैं किंतु एक ही समान मेरिट से सब चुन लिए जाते हैं। विषयों का पैनल इस प्रकार से बनाया जाए जो हमें एक सफल, सक्षम प्रशासक होने में सहायता कर सके। अर्थशास्त्र, योजनाओं का अध्ययन, ग्राम्य, नगर विकास, आर्थिक संसाधनों के विकास, मानव संसाधन अध्ययन, रक्षा, विदेश नीतियां आदि ऐसे विषय हैं जो प्रशासक के लिए उपयोगी हैं। इस प्रकार आइएएस होने पर जो विषय पढ़ाया जाएगा, उसकी पढ़ाई परीक्षा की तैयारियों से ही प्रारंभ हो जाएगी। एकाउंटिंग का ज्ञान बहुत सी सहायक सेवाओं के लिए आवश्यक है। उन सेवाओं के लिए एकाउंटिंग की परीक्षा अतिरिक्त विषय के रूप में अनिवार्य की जा सकती है। तो समाधान क्या है? पहली बात, प्रशासकों से हमारी अपेक्षाएं क्या हैं? चयन की वर्तमान प्रक्रिया में हम पुलिसिया मानसिकता के अधिकारी को ऑडिट, एकाउंट में चयनित हुआ देखते हैं। इसका उल्टा भी होता है। प्रकृति के अनुसार सेवाओं की तीन श्रेणियां बनाई जा सकती है-सामान्य प्रशासक, दूसरा पुलिस, पैरामिलिटरी, प्रवर्तन संबंधी सेवाएं, तीसरा लेखा, ऑडिट, बजट संबंधी सेवाएं। सेवाओं की श्रेणी के अनुरूप विषयों का संयुक्त सेलेबस बनाया जाना जरूरी है। इसलिए विषय विकसित किए जाने हेतु सामान्य अध्ययन के साथ प्रशासन संबंधी विषयों को समाहित कर कम से कम चार पेपर नियत किए जाएं। दूसरा, विशेषज्ञ विषयों जैसे लोक प्रशासन, एकाउंटिंग, पर्यावरण, लोक राजस्व, अपराध विज्ञान आदि को विभिन्न सेवाओं के बै्रकेट में अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया जाए। फिर वैकल्पिक विषयों की आवश्यकता नहीं होगी। अगला प्रश्न व्यक्तित्व परीक्षण का है। प्रशासक सिर्फ फाइलें पढ़ने, नोटिंग लिखने वाले मुंशियों की जमात नहीं है। आज लिखित परीक्षा में किसी को बहुत अधिक अंक मिल गए हैं तो साक्षात्कार में कम अंक होने का भी उसके चयन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन शैक्षणिक योग्यता एवं विषयों की परीक्षा ही पर्याप्त नहीं है। साक्षात्कार में न्यूनतम अंकों का स्तर प्राप्त करना भी अनिवार्य होना चाहिए। प्रशासक में व्यक्तित्व विकास की संभावनाएं होना चयन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। अगर आवेदक ने प्री परीक्षा पास की है तो इसका लाभ उसे अन्य विभागों, सेवाओं में मिले जिनके लिए वह आगे आवेदन करने वाला है। यदि वह मुख्य परीक्षा पास कर चुका है एवं साक्षात्कार तक पहंुचकर चयनित नहीं हुआ तो लिखित परीक्षा का अंकपत्र आवेदक की स्थायी योग्यता में शामिल किया जाए एवं इसके आधार पर अन्य सेवाओं में उसकी सीधे साक्षात्कार की अर्हता होनी चाहिए। प्रशासन कभी स्टील फ्रेम हुआ करता था, लेकिन राजनीति और प्रशासन के मेलजोल ने हालात बदल दिए हैं। नीतियों के कार्यान्वयन में प्रशासन की सफलता के लिए प्रशासक का सक्षम होना जरूरी है। हां, बदलाव की बयार चल रही है। सिविल सेवा परीक्षाओं को विश्वविद्यालयी विषयों के शिकंजे से आजाद कर अब एक नई जमीन तोड़ने का वक्त आ गया है। (लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं)

Tuesday, June 14, 2011

दर्जनभर कानूनों में होंगे व्यापक संशोधन

एक तरफ जहां वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अगुवाई में सरकार बाबा रामदेव को काले धन के मुद्दे पर अनशन नहीं करने के लिए मनाने में जुटी रही वहीं दूसरी तरफ वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी बुधवार को इस उधेड़बुन में लगे रहे कि काले धन के खिलाफ कानूनी शिकंजा किस तरह से और सख्त किया जाए। चार दिन पहले गठित वित्त मंत्रालय की उच्चस्तरीय समिति ने अनौपचारिक तौर पर काम शुरू कर दिया है। समिति की तरफ से कम से कम दर्जन भर मौजूदा कानूनों में व्यापक बदलाव करने की संभावना जताई जा रही है। मंगलवार को सेवानिवृत्त हुए सीबीडीटी अध्यक्ष सुधीर चंद्रा इस समिति के अध्यक्ष बने रहेंगे। पिछले शनिवार को जब समिति के गठन का फैसला किया गया था तब यह तय हुआ था कि सीबीडीटी अध्यक्ष इसके अध्यक्ष होंगे, लेकिन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का मानना है कि काले धन पर गठित समिति की अध्यक्षता सुधीर चंद्रा करेंगे तो वह जल्दी अपने सुझाव दे सकती है। इस बारे में जल्दी ही अलग से अधिसूचना जारी होगी। वित्त मंत्री स्वयं इस समिति की प्रगति की निगरानी करना चाहते हैं ताकि काले धन पर शिकंजा कसने के लिए कानूनी संशोधनों की तैयारी छह महीने में पूरी की जा सके। वित्त मंत्रालय के उच्चपदस्थ सूत्रों के मुताबिक सरकार यह मानती है कि मौजूदा कानूनी ढांचे में बदलाव के जरिए ही काले धन पर रोक लगाई जा सकती है। समिति की नजर काले धन से संबंधित लगभग दर्जन भर कानूनों पर हैं। इसमें प्रत्यक्ष कर व अप्रत्यक्ष कर से संबंधित कानूनों के अलावा प्रीवेंशन ऑफ मनी लॉंड्रिंग एक्ट, गैर-कानूनी तरीके से विदेशी मुद्रा रखने से संबंधित कानून (कोफेपोसा), कंपनी अधिनियम, उपहार कर अधिनियम, स्टांप शुल्क अधिनियम, सिक्योरिटीज कांट्रैक्ट एक्ट, डिपॉजिटरीज अधिनियम में मुख्य तौर पर कई तरह के संशोधन करने पड़ सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक कई अन्य ऐसे कानून भी हैं जिनमें थोड़े बहुत बदलाव की जरूरत पड़ेगी मसलन बैंकिंग कंपनीज, फाइनेंशियल इंस्टीट्यूट व इंटरमीडियरीज रुल्स, 2005 में कुछ बदलाव करने पड़ेंगे ताकि बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थानों में निवेश करने वालों के नाम आसानी से जांच एजेंसियों को मिल सके। इसी तरह से सरकार का अनुभव बताता है कि काले धन को छिपाने में ट्रस्ट एक्ट और साझेदारी एक्ट के कुछ प्रावधानों को भी हथियार बनाया जाता है इसलिए इनमें भी संशोधन किए जाने की संभावना है। कंपनियों के हिसाब किताब की जांच पड़ताल करने से संबंधित कानून (आइसीएआइ एक्ट), कंपनी सेक्रेटरीज एक्ट जैसे कुछ अन्य कानूनों में संशोधन पर भी विचार किया जाएगा। काले धन का मुद्दा पिछले कुछ समय से काफी गरमा गया है। पिछले पांच दिनों के भीतर वित्त मंत्रालय ने काले धन पर तीन महत्वपूर्ण समितियों के गठन का एलान किया है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण सीबीडीटी अध्यक्ष वाली समिति को माना जा रहा है।

संपत्ति का अधिकार भी कोई चीज है


करीब तीन साल पहले जेल बनाने के लिए भूमि अधिग्रहण की सरकारी अधिसूचना निकलती है और उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में देवशरण जैसे कई किसानों को भूमिहीन बना देती है। उसी साल ग्रेटर नोएडा में औद्योगिक विकास के लिए दनकौर तहसील के मकौड़ा गांव में भूमि अधिग्रहण की दूसरी अधिसूचना राधेश्याम का तीस साल पुराना मकान लील लेती है। कोई अपील-दलील नहीं, क्योंकि अधिग्रहण जनहित के लिए था और सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून केआपात अधिकार का इस्तेमाल किया था। ये मामले सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। सबसे बड़ी अदालत ने अधिग्रहण निरस्त कर दिए और आपात उपबंध के संदर्भ में सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि संपत्ति के अधिकार को इस तरह नहीं छीना जा सकता। भूमि अधिग्रहण के कई मामले जनहित बनाम संपत्ति के निजी अधिकार की बहस में उलझे हैं। नया अधिग्रहण कानून बनाने में जुटी सरकार के लिए अदालतों का बदलता नजरिया खासा अहम है। शाहजहांपुर में जेल के लिए जमीन अधिग्रहण को रद करते हुए अदालत ने अधिग्रहण के 117 साल पुराने कानून पर भी टिप्पणियां कीं। अदालत ने कहा कि ब्रिटिश काल का यह कानून, संविधान लागू होने से पहले का है। इसमें राज्य सरकार को मिली शक्तियों से आम लोगों के संपत्ति अधिकार प्रभावित होते हैं। हालांकि संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है और यह राज्य की कृपा से ही मिलता है, लेकिन यह मानना पड़ेगा कि संपत्ति पर कुछ अधिकार दिए बगैर बाकी के अधिकार बेमानी (छलावा) हो जाते है। संविधान के अनुच्छेद 13 के मुताबिक, इसके लागू होने के पहले का कोई भी कानून मौलिक अधिकार के खिलाफ नहीं हो सकता। अदालत का यह फैसला इसी साल मार्च का है। यह अधिग्रहण को लेकर सरकार के आपात अधिकार पर कानूनी नजरिया बदलने का पुख्ता प्रमाण है। इसी वजह से सरकारें अधिग्रहण के बाद अदालतों में मुकदमे हार रही हैं। कुछ ताजा फैसलों का निष्कर्ष है कि अदालत आपात स्थिति में लोगों की आपत्तियां सुने बगैर अधिग्रहण के सरकार के अधिकार को तो मानती है, लेकिन यह कहती है आपात स्थिति जमीनी तौर पर दिखनी चाहिए। खासतौर पर औद्योगिक विकास के लिए आपात उपबंध के तहत जमीन अधिग्रहण पर अदालत काफी सख्त दिखी है। मकौड़ा गांव की जमीन सरकार ने इसी मकसद से अधिग्रहीत की थी, लेकिन कोर्ट ने कहा यह अधिग्रहण वास्तव में निजी हितों के लिए है। अधिग्रहीत भूमि पर सरकार या उसकी कोई एजेंसी उद्योग नहीं लगाना चाहती, बल्कि निजी निवेश और क्षेत्र के लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को निर्देश दिया है कि जनहित के नाम पर अधिग्रहण की बारीकी से जांच हो और अदालतें सामाजिक और आर्थिक न्याय के सिद्धांत का ध्यान रखें। पश्चिम बंगाल बनाम प्रफुल्ल चूरन ला के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने किसी व्यक्ति की संपत्ति छिनने पर उसके आपत्ति दर्ज करने के अधिकार को जनहित से ऊपर माना है। कोर्ट ने कहा कि औद्योगिक एवं रिहायशी विकास की सभी योजनाएं देश की उत्पादन क्षमता बढ़ाने और आश्रय देने के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन ये इतनी आकस्मिक नहीं हो सकती कि अधिग्रहण के खिलाफ कानून में आपत्ति दर्ज कराने की संक्षिप्त प्रक्रिया समाप्त कर दी जाए।

भूमि अधिग्रहण कानून, 1894 की धारा 17 आपात स्थिति में सरकार को विशेष अधिकार देती है
आपात स्थिति में सरकार जनहित के नाम पर अधिग्रहण के लिए अधिसूचित भूमि को कब्जे में लेने का आदेश दे सकती है। कब्जे के बाद जमीन सरकार में निहित मानी जाएगी
इसकी उपधारा 2 में आपात स्थिति भी बताई गई है। जैसे नदी का अचानक धारा बदल लेना। प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए, रेलवे लाइन, सड़क, बिजली, पानी, ड्रेनेज, सिंचाई, यातायात या इसी तरह की आपात स्थिति में भूमि अधिग्रहण प्रस्ताव की अधिसूचना (धारा-4) के तुरंत बाद कलेक्टर जमीन पर कब्जा ले सकता है। अधिग्रहीत जमीन पर कोई निर्माण या घर है तो कब्जा लेने के कम कम 48 घंटे पहले भू स्वामी को नोटिस देना होगा
उपधारा 3 कहती है कि कब्जा लेते समय कलेक्टर मुआवजा राशि भी देगा, जिसमें भूमि पर खड़ी फसल या अचानक हटने से हुए अन्य नुकसान की भी भरपाई की जाएगी
उपधारा 4 सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कहा गया है कि आपात स्थिति में अधिग्रहीत भूमि के मामले में आपत्ति उठाने के उपबंध यानी धारा 5ए के प्रावधान लागू नहीं होंगे