Sunday, February 20, 2011

अनैतिकता की दमदार दलील


पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ, वकीलगण, पत्रकार व बाकी सब लोग तब दंग रह गए जब केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस के वकील वेणुगोपाल ने यह दलील पेश की कि जब सजायाफ्ता व्यक्ति विधानसभा व लोकसभा का सदस्य हो सकता है, मंत्री या मुख्यमंत्री हो सकता है तो एक आरोपी अधिकारी सीवीसी यानी केंद्रीय सतर्कता आयुक्त क्यों नहीं हो सकता? दलील हमें कितनी भी भद्दी लगे, परंतु इसमें दम है, क्योंकि संविधान की धारा 14 सभी को बराबरी का अधिकार देती है। कानूनी तौर पर उनकी दलील ठीक थी, क्योंकि जनप्रतिनिधित्व कानून में चार्जशीट तो दूर सजायाफ्ता होने पर भी ऐसी पाबंदी नहीं जब तक कि सजा दो साल से ज्यादा न हो। यह कानून 1951 का है। क्या उस समय भी राजनीतिक नेताओं के विचार एवं आचरण ऐसे ही थे जैसा कि आज है? शायद नहीं। फिर सवाल है कि ऐसा प्रावधान ही क्यों रखा गया। यदि 1951 के निर्वाचन कानून में ऐसा प्रावधान है तो 2003 का सीवीसी कानून भी कोई पीछे नहीं। आश्चर्य की बात है कि जिस सीवीसी का काम भ्रष्टाचार पर लगाम कसना है उसके लिए ईमानदारी आवश्यक नहीं। कानून की धारा 3 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं कि बेईमान होने पर उसे रोका जा सके। आश्चर्य की बात यह है कि इसी कानून के तहत सीबीआइ निदेशक व प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक की नियुक्ति का प्रावधान है। हालांकि इसमें यह बात स्पष्ट है कि दोनों संवैधानिक नियुक्तियों के लिए ईमानदारी एक अनिवार्य योग्यता होगी। इस कानून में इन्हीं तीन लोगों की नियुक्ति का प्रावधान है। क्या इसका यह अर्थ है कि बाकी संवैधानिक पदों पर बैठने वाले बेईमान हो सकते हैं और नियमित सरकारी अधिकारी ही ईमानदार हैं। शायद थॉमस के वकील जाने-अनजाने में यही विसंगति अदालत के ध्यान में ला रहे थे। यहां यह प्रश्न पैदा होता है कि यह छूट जानकर दी गई होगी अथवा फिर गलती से रह गई? यदि गलती से रह गई है तो न केवल संबंधित सरकारी अधिकारीगण व कानून मंत्रालय दोषी है, बल्कि लोकसभा व राज्यसभा के सभी सदस्य भी इस दंडनीय लापरवाही के लिए कसूरवार हैं। यदि यह सब जानबूझकर किया गया है तो राष्ट्र की रूह को कंपाने के लिए यह काफी है। क्या यह भ्रष्टाचार को फैलाने व संरक्षण देने को काफी नहीं? यहां यह भी स्पष्ट कर दिया जाए कि सीवीसी एक्ट विनीत नारायण मामला (जो कि जैन हवाला केस के नाम से विख्यात है) के फैसले पर आधारित है। इस मामले में उच्चतम न्यायालय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया था कि सीवीसी असंदिग्ध सत्यनिष्ठा वाला हो। बाद में यह मामला कानून आयोग ने भी इसकी पुनरावृत्ति की। इस सबके बाद भी इस शर्त को न मानना बहुत गंभीर मामला है। इस मामले ने एक बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या राजनीतिज्ञ व संवैधानिक पदों पर बैठने वाले संविधान के समता के प्रावधान से ऊपर हैं। शायद उन्हें संविधान से ऊपर बिठाना हमारी मूलभूत समस्याओं का कारण है। प्रजातंत्र में जनता राज्य की बागडोर नेताओं के हाथ में दे देती है और राज्य वैसा ही चलता है जैसा यह लोग चलाते हैं। राजनीतिज्ञ आमतौर पर यह प्रश्न पूछते हैं कि क्या बाकी सब ठीक है और वे ही खराब हैं। सच्चाई यह है कि बाकी जो भी बुराइयां हैं उन्हें दूर करने का संज्ञान राजनीतिज्ञों को ही लेना होता है, क्योंकि कार्यपालिका उनके हाथ में है। यदि वे सरकारी तंत्र को नियंत्रित नहीं कर सकते तो उनका कसूर है। थॉमस मामले पर माननीय उच्चतम न्यायालय को चाहिए को वह इसकी पूरी तह में जाए, क्योंकि यह मामला हमारे आधारभूत ढांचे से संबंधित है। अब आवश्यकता है कि जनप्रतिनिधित्व कानून व सीवीसी कानून के वर्तमान प्रावधानों को संविधान के विरुद्ध करार दिया जाए तथा नए कानून बनाने का आदेश दिया जाए। इसके अलावा सीवीसी चुनने का दायरा भी बढ़ाया जाए। यदि 65 वर्ष तक पर्याप्त योग्य व्यक्ति नहीं मिलते तो उम्रसीमा 70 साल की जाए, परंतु यह सुनिश्चित हो कि सीवीसी ईमानदार व्यक्ति हो और वह गैर राजनीतिक हो। इस मानक पर प्रथमदृष्टया थॉमस खरे नहीं उतरते। सीवीसी की धारा 26 के तहत डीएसपीई एक्ट की धारा 6 ए के प्रावधान को तत्काल समाप्त करने की आवश्यकता है। इसके तहत संयुक्त सचिव व उससे ऊपर के किसी अधिकारी की कोई भी जांच बिना सरकार की इजाजत के नहीं की जा सकती। उच्चतम न्यायालय ने विनीत नारायण के मामले में यह व्यवस्था 1997 में दी थी, परंतु इसे 2003 के कानून में डाल दिया गया, जो विवेकहीन है और संविधान के अनुच्छेद 14 के विरुद्ध है। (लेखक हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक व सीबीआइ के पूर्व संयुक्त निदेशक हैं)


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