पिछले दिनों केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री ने नक्सल समस्या के हल के लिए भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 68 में संसोधन करने की बात कही। जनजातीय मंत्री कांतिलाल भूरिया की उपस्थिति में दिए गए इस बयान को राजनीतिक गलियारे में वनाधिकार कानून के महत्व की स्वीकृति के रूप में देखना चाहिए।
देश के 180 जिलों में जंगल हैं और करीब 25 करोड़ लोग जंगल पर आजीविका के लिए निर्भर हैं। ऐसा देखने में आया है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बहुत बड़ी संख्या में वन विभाग द्वारा लोगों पर भारतीय वन अधिनियम के तहत मुकदमे दायर किए गए हैं, जिनके बारे में गृह मंत्रालय ने भी रिपोर्ट दी है। वनवासी समुदाय के खिलाफ गलत मुकदमे थोपे जाने की व्यवस्था समाप्त होनी चाहिए और वनाधिकार कानून-2006 के तहत एक जनवादी व्यवस्था कायम होनी चाहिए।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए वन-पर्यावरण और जनजातीय मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से एक संयुक्त समीक्षा समिति का गठन किया गया था, जिसने वन क्षेत्र वाले राज्यों का दौरा करके 300 पन्नों की एक रिपोर्ट तैयार की, जिसमें वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन में वन विभाग एवं वन मंत्रालय को सबसे बड़ी बाधा माना। इसी कारण केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री को यह बयान देने के लिए बाध्य होना पड़ा।
भारतीय वन अधिनियम, 1927 की संरचना ब्रिटिश हुकूमत ने वनों के दोहन और राजस्व वसूली के उद्देश्य से किया था। वर्ष 1861 में अंगरेजों द्वारा लागू इस काले कानून का वनवासी समुदायों की बेदखली, उत्पीड़न और जंगल की लूट के लिए जमकर इस्तेमाल किया गया, जो बदस्तूर जारी है। 15 दिसंबर, 2006 को केंद्रीय वनाधिकार कानून, 2006 संसद में पास हुआ और एक जनवरी, 2008 से इसे देश भर में लागू कर दिया गया। पर जमीनी सचाई यही है कि न तो इस कानून को वास्तविक रूप में लागू करके वनवासी समुदायों को उनके अधिकार सौंपने में केंद्र सरकार ने कोई रुचि दिखाई और न ही इक्का-दुक्का छोड़कर राज्य सरकारों ने इसे अमल में लाने की कोई विशेष कोशिश की। बल्कि अपने अस्तित्व पर मंडराते खतरे को भांपकर वन विभाग ने वनवासी समुदायों के ऊपर हमला तेज कर दिया। जंगल से प्राप्त होने वाली रोजमर्रा की जरूरी चीजों पर भी रोक लगा दी गई।
उत्तर प्रदेश के दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र में बसे 46 थारू आदिवासी बहुल गांवों में 2008 में करीब तीन करोड़ रुपये के सामान और नकदी की वसूली के बाद वनकर्मियों ने आग लगा दी, जिससे हजारों लोग बरसात के मौसम में बेघर हो गए। फूस एवं जलावन की लकड़ी लेने जंगल गए लोगों पर भारतीय वनाधिकार अधिनियम 1927 के तहत फरजी मुकदमे लाद दिए गए। लगभग यही प्रक्रिया पूरे देश में अपनाई गई। इसके अलावा देश भर में वन्य जंतु सुरक्षा अधिनियम, 1972 के तहत स्थापित पार्क, सेंक्चुयरी आदि क्षेत्रों में पीढ़ियों से रह रहे लोगों की बेदखली की प्रक्रिया को और तेज कर दिया गया।
वनाधिकार कानून पारित होने पर उम्मीद जगी कि अब वनवासी समुदायों को न्याय मिलेगा, पर वन विभाग, सामंती प्रवृतियों से ग्रस्त सरकारें व प्रशासनिक अधिकारीगण इस क्रांतिकारी कानून के अमल के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा साबित होने लगे। नतीजतन वन क्षेत्रों में सरकारों के प्रति तीव्र आक्रोश बढ़ने लगा। वनकर्मियों और वन समुदायों के बीच संघर्ष और तेज होने की आशंका प्रबल होती गई। इन्हीं परिस्थितियों में सरकार को वनाधिकार कानून के अमल की समीक्षा के लिए संयुक्त समिति गठित करनी पड़ी।
समिति द्वारा सुझाए प्रस्तावों में पुराने सभी वन संबंधी कानूनों को निष्प्रभावी कर वनाधिकार कानून के तहत व्यवस्था कायम करने पर बल दिया गया है। ऐसे में इस कानून की किसी एक धारा में संशोधन ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होगा। दूसरी तरफ वनाधिकार कानून में भी अभी कई तरह के संशोधनों की जरूरत है। मसलन, अन्य परंपरागत वनवासियों के लिए 75 वर्ष के प्रमाण की अनिवार्यता के सवाल पर भी लोगों में खासा रोष है। ऐसे में, अगर सरकार चाहती है कि वनाधिकार कानून के तहत एक जनवादी व्यवस्था कायम हो, तो इसके लिए पुराने कानूनों को रद्द कर वनाधिकार कानून में कुछ जरूरी संशोधन करके इसे वास्तविक रूप में अमल में लाना होगा।
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