पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ, वकीलगण, पत्रकार व बाकी सब लोग तब दंग रह गए जब केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस के वकील वेणुगोपाल ने यह दलील पेश की कि जब सजायाफ्ता व्यक्ति विधानसभा व लोकसभा का सदस्य हो सकता है, मंत्री या मुख्यमंत्री हो सकता है तो एक आरोपी अधिकारी सीवीसी यानी केंद्रीय सतर्कता आयुक्त क्यों नहीं हो सकता? दलील हमें कितनी भी भद्दी लगे, परंतु इसमें दम है, क्योंकि संविधान की धारा 14 सभी को बराबरी का अधिकार देती है। कानूनी तौर पर उनकी दलील ठीक थी, क्योंकि जनप्रतिनिधित्व कानून में चार्जशीट तो दूर सजायाफ्ता होने पर भी ऐसी पाबंदी नहीं जब तक कि सजा दो साल से ज्यादा न हो। यह कानून 1951 का है। क्या उस समय भी राजनीतिक नेताओं के विचार एवं आचरण ऐसे ही थे जैसा कि आज है? शायद नहीं। फिर सवाल है कि ऐसा प्रावधान ही क्यों रखा गया। यदि 1951 के निर्वाचन कानून में ऐसा प्रावधान है तो 2003 का सीवीसी कानून भी कोई पीछे नहीं। आश्चर्य की बात है कि जिस सीवीसी का काम भ्रष्टाचार पर लगाम कसना है उसके लिए ईमानदारी आवश्यक नहीं। कानून की धारा 3 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं कि बेईमान होने पर उसे रोका जा सके। आश्चर्य की बात यह है कि इसी कानून के तहत सीबीआइ निदेशक व प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक की नियुक्ति का प्रावधान है। हालांकि इसमें यह बात स्पष्ट है कि दोनों संवैधानिक नियुक्तियों के लिए ईमानदारी एक अनिवार्य योग्यता होगी। इस कानून में इन्हीं तीन लोगों की नियुक्ति का प्रावधान है। क्या इसका यह अर्थ है कि बाकी संवैधानिक पदों पर बैठने वाले बेईमान हो सकते हैं और नियमित सरकारी अधिकारी ही ईमानदार हैं। शायद थॉमस के वकील जाने-अनजाने में यही विसंगति अदालत के ध्यान में ला रहे थे। यहां यह प्रश्न पैदा होता है कि यह छूट जानकर दी गई होगी अथवा फिर गलती से रह गई? यदि गलती से रह गई है तो न केवल संबंधित सरकारी अधिकारीगण व कानून मंत्रालय दोषी है, बल्कि लोकसभा व राज्यसभा के सभी सदस्य भी इस दंडनीय लापरवाही के लिए कसूरवार हैं। यदि यह सब जानबूझकर किया गया है तो राष्ट्र की रूह को कंपाने के लिए यह काफी है। क्या यह भ्रष्टाचार को फैलाने व संरक्षण देने को काफी नहीं? यहां यह भी स्पष्ट कर दिया जाए कि सीवीसी एक्ट विनीत नारायण मामला (जो कि जैन हवाला केस के नाम से विख्यात है) के फैसले पर आधारित है। इस मामले में उच्चतम न्यायालय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया था कि सीवीसी असंदिग्ध सत्यनिष्ठा वाला हो। बाद में यह मामला कानून आयोग ने भी इसकी पुनरावृत्ति की। इस सबके बाद भी इस शर्त को न मानना बहुत गंभीर मामला है। इस मामले ने एक बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या राजनीतिज्ञ व संवैधानिक पदों पर बैठने वाले संविधान के समता के प्रावधान से ऊपर हैं। शायद उन्हें संविधान से ऊपर बिठाना हमारी मूलभूत समस्याओं का कारण है। प्रजातंत्र में जनता राज्य की बागडोर नेताओं के हाथ में दे देती है और राज्य वैसा ही चलता है जैसा यह लोग चलाते हैं। राजनीतिज्ञ आमतौर पर यह प्रश्न पूछते हैं कि क्या बाकी सब ठीक है और वे ही खराब हैं। सच्चाई यह है कि बाकी जो भी बुराइयां हैं उन्हें दूर करने का संज्ञान राजनीतिज्ञों को ही लेना होता है, क्योंकि कार्यपालिका उनके हाथ में है। यदि वे सरकारी तंत्र को नियंत्रित नहीं कर सकते तो उनका कसूर है। थॉमस मामले पर माननीय उच्चतम न्यायालय को चाहिए को वह इसकी पूरी तह में जाए, क्योंकि यह मामला हमारे आधारभूत ढांचे से संबंधित है। अब आवश्यकता है कि जनप्रतिनिधित्व कानून व सीवीसी कानून के वर्तमान प्रावधानों को संविधान के विरुद्ध करार दिया जाए तथा नए कानून बनाने का आदेश दिया जाए। इसके अलावा सीवीसी चुनने का दायरा भी बढ़ाया जाए। यदि 65 वर्ष तक पर्याप्त योग्य व्यक्ति नहीं मिलते तो उम्रसीमा 70 साल की जाए, परंतु यह सुनिश्चित हो कि सीवीसी ईमानदार व्यक्ति हो और वह गैर राजनीतिक हो। इस मानक पर प्रथमदृष्टया थॉमस खरे नहीं उतरते। सीवीसी की धारा 26 के तहत डीएसपीई एक्ट की धारा 6 ए के प्रावधान को तत्काल समाप्त करने की आवश्यकता है। इसके तहत संयुक्त सचिव व उससे ऊपर के किसी अधिकारी की कोई भी जांच बिना सरकार की इजाजत के नहीं की जा सकती। उच्चतम न्यायालय ने विनीत नारायण के मामले में यह व्यवस्था 1997 में दी थी, परंतु इसे 2003 के कानून में डाल दिया गया, जो विवेकहीन है और संविधान के अनुच्छेद 14 के विरुद्ध है। (लेखक हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक व सीबीआइ के पूर्व संयुक्त निदेशक हैं)
Sunday, February 20, 2011
Monday, February 14, 2011
वनवासियों के हित में
पिछले दिनों केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री ने नक्सल समस्या के हल के लिए भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 68 में संसोधन करने की बात कही। जनजातीय मंत्री कांतिलाल भूरिया की उपस्थिति में दिए गए इस बयान को राजनीतिक गलियारे में वनाधिकार कानून के महत्व की स्वीकृति के रूप में देखना चाहिए।
देश के 180 जिलों में जंगल हैं और करीब 25 करोड़ लोग जंगल पर आजीविका के लिए निर्भर हैं। ऐसा देखने में आया है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बहुत बड़ी संख्या में वन विभाग द्वारा लोगों पर भारतीय वन अधिनियम के तहत मुकदमे दायर किए गए हैं, जिनके बारे में गृह मंत्रालय ने भी रिपोर्ट दी है। वनवासी समुदाय के खिलाफ गलत मुकदमे थोपे जाने की व्यवस्था समाप्त होनी चाहिए और वनाधिकार कानून-2006 के तहत एक जनवादी व्यवस्था कायम होनी चाहिए।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए वन-पर्यावरण और जनजातीय मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से एक संयुक्त समीक्षा समिति का गठन किया गया था, जिसने वन क्षेत्र वाले राज्यों का दौरा करके 300 पन्नों की एक रिपोर्ट तैयार की, जिसमें वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन में वन विभाग एवं वन मंत्रालय को सबसे बड़ी बाधा माना। इसी कारण केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री को यह बयान देने के लिए बाध्य होना पड़ा।
भारतीय वन अधिनियम, 1927 की संरचना ब्रिटिश हुकूमत ने वनों के दोहन और राजस्व वसूली के उद्देश्य से किया था। वर्ष 1861 में अंगरेजों द्वारा लागू इस काले कानून का वनवासी समुदायों की बेदखली, उत्पीड़न और जंगल की लूट के लिए जमकर इस्तेमाल किया गया, जो बदस्तूर जारी है। 15 दिसंबर, 2006 को केंद्रीय वनाधिकार कानून, 2006 संसद में पास हुआ और एक जनवरी, 2008 से इसे देश भर में लागू कर दिया गया। पर जमीनी सचाई यही है कि न तो इस कानून को वास्तविक रूप में लागू करके वनवासी समुदायों को उनके अधिकार सौंपने में केंद्र सरकार ने कोई रुचि दिखाई और न ही इक्का-दुक्का छोड़कर राज्य सरकारों ने इसे अमल में लाने की कोई विशेष कोशिश की। बल्कि अपने अस्तित्व पर मंडराते खतरे को भांपकर वन विभाग ने वनवासी समुदायों के ऊपर हमला तेज कर दिया। जंगल से प्राप्त होने वाली रोजमर्रा की जरूरी चीजों पर भी रोक लगा दी गई।
उत्तर प्रदेश के दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र में बसे 46 थारू आदिवासी बहुल गांवों में 2008 में करीब तीन करोड़ रुपये के सामान और नकदी की वसूली के बाद वनकर्मियों ने आग लगा दी, जिससे हजारों लोग बरसात के मौसम में बेघर हो गए। फूस एवं जलावन की लकड़ी लेने जंगल गए लोगों पर भारतीय वनाधिकार अधिनियम 1927 के तहत फरजी मुकदमे लाद दिए गए। लगभग यही प्रक्रिया पूरे देश में अपनाई गई। इसके अलावा देश भर में वन्य जंतु सुरक्षा अधिनियम, 1972 के तहत स्थापित पार्क, सेंक्चुयरी आदि क्षेत्रों में पीढ़ियों से रह रहे लोगों की बेदखली की प्रक्रिया को और तेज कर दिया गया।
वनाधिकार कानून पारित होने पर उम्मीद जगी कि अब वनवासी समुदायों को न्याय मिलेगा, पर वन विभाग, सामंती प्रवृतियों से ग्रस्त सरकारें व प्रशासनिक अधिकारीगण इस क्रांतिकारी कानून के अमल के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा साबित होने लगे। नतीजतन वन क्षेत्रों में सरकारों के प्रति तीव्र आक्रोश बढ़ने लगा। वनकर्मियों और वन समुदायों के बीच संघर्ष और तेज होने की आशंका प्रबल होती गई। इन्हीं परिस्थितियों में सरकार को वनाधिकार कानून के अमल की समीक्षा के लिए संयुक्त समिति गठित करनी पड़ी।
समिति द्वारा सुझाए प्रस्तावों में पुराने सभी वन संबंधी कानूनों को निष्प्रभावी कर वनाधिकार कानून के तहत व्यवस्था कायम करने पर बल दिया गया है। ऐसे में इस कानून की किसी एक धारा में संशोधन ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होगा। दूसरी तरफ वनाधिकार कानून में भी अभी कई तरह के संशोधनों की जरूरत है। मसलन, अन्य परंपरागत वनवासियों के लिए 75 वर्ष के प्रमाण की अनिवार्यता के सवाल पर भी लोगों में खासा रोष है। ऐसे में, अगर सरकार चाहती है कि वनाधिकार कानून के तहत एक जनवादी व्यवस्था कायम हो, तो इसके लिए पुराने कानूनों को रद्द कर वनाधिकार कानून में कुछ जरूरी संशोधन करके इसे वास्तविक रूप में अमल में लाना होगा।
Friday, February 11, 2011
प्रेस एवं पुस्तक पंजीकरण कानून संशोधन के प्रस्ताव को हरी झंडी
केंद्र सरकार ने प्रेस एवं पुस्तक पंजीकरण कानून 1867 में व्यापक संशोधन करने का फैसला किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में यहां बृहस्पतिवार को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में वर्षों पुरानी प्रक्रि या को चुस्त बनाने और प्रिंट मीडिया नीति के कुछ मुद्दों से निपटने के लिए प्रेस एवं पुस्तक पंजीकरण कानून 1867 में व्यापक फेरबदल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने बैठक के बाद यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रस्तावित प्रेस और पुस्तक एवं प्रकाशन पंजीकरण विधेयक 2010 में प्रकाशन, समाचारपत्र, पत्र पत्रिका एवं न्यूजलेटर आदि जैसी कई नई परिभाषाओं को शामिल किया गया है। उन्होंने बताया कि प्रस्तावित विधान के तहत आतंकवादी कार्रवाइयों या राष्ट्र की सुरक्षा के खिलाफ किए गए किसी कार्य के लिए दोषी व्यक्तियों को कोई भी प्रकाशन लाने की इजाजत नहीं दी जाएगी। सोनी ने बताया कि पुराने कानून में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं था। यह व्यापक विधेयक जल्द ही संसद में लाया जाएगा। यह व्यापक विधान शीर्षक की जांच पड़ताल, अखबारों के इंटरनेट संस्करणों सहित प्रकाशनों की परिभाषा और अगंभीर प्रकाशकों को हतोत्साहित करने के लिए शीर्षक को रोके रखने पर रोक और विदेशी समाचार सामग्री और विदेशी निवेश की सीमा जैसे मुद्दों से निपटेगा। प्रस्तावित विधेयक के तहत शीर्षक आवंटित होने के एक वर्ष के अंदर प्रकाशन शुरू कर देना पड़ेगा। शीर्षक के पंजीकरण के बारे में मेनन ने बताया कि लंबे समय से इस्तेमाल नहीं हो रहे शीर्षकों को आरएनआई ही रोक देगी।
Monday, February 7, 2011
न्याय का अधिकार बिल लाने की तैयारी
चंडीगढ़ केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री वीरप्पा मोइली ने कहा कि भ्रष्टाचार को समाप्त करने व न्याय अधिकारों के लिए लोकसभा में जल्दी ही लोकपाल व न्याय का अधिकार जैसे बिल लाए जाएंगे। वे यहां पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सूचना व शिक्षा के अधिकार के बाद अब केंद्र सरकार राइट टू जस्टिस लागू करने की तैयारी में है। राइट टू जस्टिस में सभी को न्याय देने के प्रयास होंगे। खासतौर पर गरीब लोगों को सस्ता व सुलभ न्याय दिलाया जाएगा। मोइली ने कहा कि केंद्र सरकार अगले छह से सात माह में राइट टू जस्टिस लागू करने का प्रयास कर रही है। देशभर की अदालतों में पिछले कई सालों से लंबित मामलों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि 31 दिसंबर 2012 तक तीन साल से अधिक सभी मामले निपटा दिए जाने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार की कोशिश है कि हर मामले का निपटारा तीन साल के भीतर हो जाए। उन्होंने कहा कि कानून मंत्रालय लोगों को आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक न्याय दिलाने में जुटा है। देश में हुई उन्नति का ही परिणाम है कि इन दिनों अमेरिका में काम कर रहे ज्यादातर आइटी विशेषज्ञ भारतीय हैं। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 2020 तक देश साइंस एंड टेक्नालाजी के क्षेत्र में भी आगे होगा। भविष्य में सरकार रिसर्च पर अधिक जोर देगी। उन्होंने कहा कि देश में बढ़ते भ्रष्टाचार पर सरकार गंभीर है। इसे रोकने के लिए ठोस नीतियां बनाई जा रही हैं। भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए लोकपाल बिल लाने के प्रयास हो रहे हैं। सरकार की कोशिश है कि भ्रष्टाचार के मामले जल्द से जल्द निपटें। भ्रष्ट व्यक्ति को एक साल के अंदर सजा दिलाने की कोशिश होगी। इससे पहले स्थानीय सांसद व केंद्रीय साइंस एंड टेक्नालाजी व संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल, चंडीगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष बीबी बहल ने उनका कांग्रेस भवन में पहुंचने पर स्वागत किया। उधर, चंडीगढ़ में चुनाव सुधार कार्यक्रम में हिस्सा लेने से पूर्व कुछ चुनिंदा पत्रकारों से बातचीत में कानून मंत्री मोइली ने भ्रष्टाचार के मामले में लगातार घिरती जा रही केंद्र सरकार का बचाव करते हुए कहा है कि सरकार भ्रष्टाचार को जड़ से उखाडने के लिए प्रतिबद्ध है और भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आने पर सरकार ने निष्पक्ष होकर कार्रवाई की है। चाहे आदर्श घोटाला हो या 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार की शिकायत मिलने पर 60 दिन के अंदर जांच पूरी किए जाने के आदेश दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में अनियमितताएं पाए जाने पर पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री ए. राजा को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसके अलावा महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के खिलाफ मामला दर्ज किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस के विषय में भी केंद्र सरकार कोई बात नही छिपा रही। भ्रष्टाचार के मामले पर एक बार फिर कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा का मामला उठाते हुए मोइली ने कहा कि भाजपा द्वारा येद्दयुरप्पा के मामले में अपनाए जा रहे दोहरे मानदंड देश के सामने हैं।
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