Wednesday, May 23, 2012

कला-साहित्य सर्जकों को ताउम्र आर्थिक सुरक्षा


फिल्म, टीवी सीरियल व अन्य कार्यक्रमों व कृतियों की कथा-पटकथा और गीत लिखने वाले लेखकों तथा उन्हें सुरों से सजाने वाले संगीतकारों का हक अब कोई नहीं मार सकेगा। संसद ने कानून बनाकर इनकी आजीवन आर्थिक सुरक्षा का इंतजाम कर दिया है। अब कांट्रैक्ट के बाद इन कृतियों के प्रसारण या नकल की स्थिति में प्रसारकों को कलाकारों को हर बार रायल्टी देनी पड़ेगी। लोकसभा ने मंगलवार को कापीराइट एक्ट (संशोधन) विधेयक 2012 को मंजूरी दे दी, जिसे राज्यसभा 17 मई को ही पारित कर चुका है। लोस में सभी दलों ने सरकार के इस कदम को कलाकारों के हक में उठाया गया सराहनीय कदम बताया। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने लोस में विधेयक प्रस्तुत करते हुए कहा, निर्माताओं के रवैये की वजह से अनेक गरीब कलाकारों को जीवन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। नया कानून वृद्ध कलाकारों को मान- सम्मान से जीवन यापन में समर्थ बनाएगा। उन्होंने कहा, मशहूर शहनाई वादक भारत रत्‍‌न उस्ताद बिस्मिल्ला खां तथा सितार सिद्ध पंडित रविशंकर जैसे असाधारण कलाकारों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्हें मकान का किराया देने तक के लाले पड़ गए। विधेयक टीवी और रेडियो प्रसारकों को बाध्य करता है कि वे जितनी बार भी किसी कलाकार की कोई रचना प्रसारित करेंगे उतनी बार उसे रायल्टी देंगे। एक्ट में लेखकों की उनकी कृतियों पर अधिकार जताने के विशेष प्रावधान हैं। गीतकार म्यूजिक कंपनियों के साथ रायल्टी पर सौदेबाजी कर सकेंगे। विधेयक किसी भी साहित्य, नाटक या संगीत संबंधी कृति की मूल रिकॉर्डिग के बाद पांच साल तक उसका कवर वर्जन लाने पर पाबंदी लगाता है। छात्रों को शोध कार्यो के लिए कॉपीराइट एक्ट से छूट है पर पायरेसी करने वालों के लिए जुर्माने के साथ ही दो वर्ष जेल का प्रावधान है। सिब्बल ने कहा, वह चाहते थे कि फिल्म के प्रमुख निर्देशक को निर्माता के साथ लेखक की मान्यता मिले, लेकिन संसद की स्थायी समिति ने राय दी है कि अभी प्रमुख निर्देशक को रायल्टी में हिस्सेदार बनाने का वक्त नहीं आया है। सरकार के कदम का स्वागत करते हुए सदन में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने कहा, पं. रविशंकर से लेकर एआर रहमान तक ने कापीराइट एक्ट में संशोधन की मांग की थी।

Thursday, November 17, 2011

ओबीसी आरक्षण का दायरा बढ़ा

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नई जातियों को जोड़ने के उद्देश्य से अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी ) सूची में संशोधन संबंधी सिफारिशों को बुधवार को मंजूरी दे दी। इससे लगभग 20 राज्यों में चार दर्जन से अधिक जातियों को नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण का लाभ हासिल हो सकेगा। सूत्रों ने बताया कि पिछड़ा वर्ग संबंधी राष्ट्रीय आयोग ने अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी थीं, जिसमें 20 राज्यों व संघशासित क्षेत्रों की 70 से अधिक जातियों को ओबीसी सूची में शामिल किए जाने का प्रस्ताव था। संशोधन संबंधी प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद अब इस आशय की अधिसूचना जारी की जाएगी। मौजूदा आरक्षण नीति के तहत सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। सरकारी बयान के मुताबिक आयोग ने जिन राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों में नई जातियों को ओबीसी में शामिल करने की सिफारिश की है, वे आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तमिलनाडु, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, अंडमान निकोबार, चंडीगढ़, दिल्ली और पुडुचेरी हैं। तकनीकी शिक्षा संस्थानों में धांधली रोकने संबंधी विधेयक को मंजूरी : कैपिटेशन फीस या अन्य तरह के शुल्क वसूलकर छात्रों और उनके माता-पिता को परेशान करने वाले तकनीकी एवं मेडिकल शिक्षा संस्थानों पर लगाम कसने वाले विधेयक में संशोधन के एक प्रस्ताव को सरकार ने बुधवार को मंजूरी दे दी। केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में तकनीकी शिक्षा संस्थान, चिकित्सा शिक्षा संस्थान एवं विविद्यालय में अनाचरण प्रतिबंधित करने संबंधी विधेयक 2010 में संशोधन को मंजूरी दी गई। अब इस विधेयक का नाम बदलकर उच्च शिक्षा संस्थान कानून 2011 होगा। सरकारी बयान के मुताबिक विधेयक को तीन मई 2010 को लोकसभा में पेश किया गया था। उसके बाद उसे मानव संसाधन विकास संबंधी संसद की स्थायी समिति को भेजा गया। समिति ने 30 मई 2011 को अपनी सिफारिशें सौंप दीं। इस विधेयक के पारित होने से कई छात्रों को फायदा होगा विशेष रूप से निजी मेडिकल एवं तकनीकी शिक्षा संस्थानों में प्रवेश लेने वाले छात्रों को अब कैपिटेशन फीस या अन्य शुल्क से बचने में मदद मिल सकेगी जो ऐसे संस्थान अनावश्यक रूप से दबाव बनाकर वसूलते हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता और छात्रों के हितों की सुरक्षा के बीच संतुलन जनहित में होगा। विधेयक में प्रस्ताव किया गया है कि कानून सभी उच्च शिक्षा संस्थानों पर लागू होगा लेकिन कृषि शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में सक्रिय संस्थानों पर यह लागू नहीं होगा। विधेयक में यह प्रस्ताव भी है कि यदि किसी छात्र को कोई परेशानी या शिकायत है तो उसके निपटारे के लिए समयसीमा होगी। न्यूनतम पात्रता नहीं रखने वाले किसी भी व्यक्ति को ऐसे शिक्षा संस्थानों में नहीं रखा जाएगा। पेंशन कोष नियामक विधेयक को हरी झंडी : यह विधेयक संसद के आगामी शीतकालीन सत्र के दौरान पेश किए जाने की संभावना है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में यह मंजूरी दी गई। मणिपुर में खुलेंगे दो जवाहर नवोदय विद्यालय : केंद्र ने मणिपुर में दो जवाहर नवोदय विद्यालय खोलने का फैसला किया है। ये विद्यालय उरूखुल और सेनापति जिलों में खोले जाएंगे। इन पर 12वीं और 13वीं योजनावधि के दौरान 72 करोड रुपए खर्च का अनुमान है। ये नये स्कूल जिलों के ऐसे इलाकों के बच्चों की शैक्षिक जरूरत को पूरा करेंगे, जहां अब तक शिक्षा का प्रसार नहीं है। एक्जिम बैंक की अधिकृत पूंजी बढ़ाने के लिए होगा संशोधन : कानून में संशोधन के लिए पेश किए जाने वाले विधेयक में प्रस्ताव है कि एक्जिम बैंक की अधिकृत पूंजी 2000 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 10000 करोड़ रुपए की जाए और दो पूर्णकालिक निदेशकों की नियुक्ति की जाए जो अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक के अलावा होंगे। कैबिनेट बैठक के बाद जारी एक सरकारी बयान में कहा गया कि विधेयक में यह प्रस्ताव भी है कि कें द्र सरकार भविष्य में यदि चाहे तो बैंक की अधिकृत पूंजी में और बढ़ोतरी कर सकती है और इसके लिए कानून में संशोधन की आवश्यकता नहीं होगी। पूर्वोत्तर ग्रामीण आजीविका परियोजना को मंजूरी : मंत्रिमंडल के आर्थिक मामलों की समिति ने चार पूर्वोत्तर राज्यों के ग्रामीण इलाकों में खासकर महिलाओं, बेरोजगार युवकों और सर्वाधिक वंचित लोगों के रोजगार संबंधी 683 करोड़ 20 लाख रुपए की अनुमानित लागत वाली पूर्वोत्तर ग्रामीण आजीविका परियोजना के अमल को मंजूरी दी। इस परियोजना की लागत में वि बैंक 614 करोड़ 80 लाख रुपए की मदद आसान ऋण के रू प में तथा केंद्र 68 करोड़ 40 लाख रुपए की वित्तीय मदद करेगा। पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय इस परियोजना के मिजोरम के एजल व लुंगाई जिलों में नागालैंड के पीरेन व तुनसांग जिलों में सिक्किम के दक्षिण, पश्चिम और पूरब के 15 सबसे गरीब पंचायत वाडरें, त्रिपुरा के पश्चिम और उत्तरी जिलों में लागू कराएगा।

Friday, October 21, 2011

उत्तराखंड में लागू रहेगा भूमि सुधार संशोधन कानून


उत्तराखंड में फिलहाल जमींदारी उन्मूलन भूमि सुधार संशोधन कानून लागू रहेगा और भूमिहीनों पर 250 वर्गमीटर से ज्यादा कृषि भूमि खरीदने पर रोक लगी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने संशोधन कानून निरस्त करने के उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले पर फिलहाल रोक लगा दी है। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने गत 22 सितंबर को बाहरी लोगों के जमीन खरीदने के अधिकार सीमित करने वाला संशोधन कानून निरस्त कर दिया था। उत्तराखंड सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। रोक का आदेश बृहस्पतिवार को न्यायमूर्ति बीएस चौहान व न्यायमूर्ति एके पटनायक की पीठ ने उत्तराखंड सरकार की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई बाद जारी किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका पर प्रतिपक्षी सर्वेश शर्मा को जवाब दाखिल करने के लिए नोटिस भी जारी किया है। इससे पहले राज्य सरकार की ओर से पेश वकील रचना श्रीवास्तव ने पीठ से हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाने की मांग की। उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट का यह कहना गलत है कि राज्य सरकार ने एक ही जैसे लोगों के बीच दो श्रेणियां बना दी हैं। या फिर इस कानून से बाहरी लोगों के उत्तराखंड में बसने के अधिकार बाधित होते हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने सिर्फ कृषि भूमि की खरीद फरोख्त नियमित करने की कोशिश की है। संशोधन कानून के बाद भी भूमिहीन व्यक्ति सरकार की अनुमति से 250 वर्गमीटर से ज्यादा भूमि खरीद सकता है। राज्य सरकार ने की याचिका में कहा गया है कि जमींदारी उन्मूलन व भूमि सुधार (जेडएएलआर) संशोधन अधिनियम 2003 लाने का उद्देश्य राज्य में कृषि भूमि की अनियमित खरीद-फरोख्त रोकना और छोटे किसानों का हित संरक्षित करना है। इसके अलावा राज्य की सीमाएं अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से लगी हैं। ऐसा इसलिए किया गया ताकि आतंकवादियों और घुसपैठियों द्वारा राज्य में भूमि की खरीद- फरोख्त न हो। इससे राज्य को खतरा हो सकता है। इस कानून का उद्देश्य लोगों के बीच भेदभाव करना या श्रेणी में बांटना नहीं था। उत्तराखंड सरकार ने जेडएएलआर कानून में 12 सितंबर 2003 को संशोधन किया था। संशोधित कानून में कृषि भूमि रखने वाले भूमिदार को साढ़े 12 एकड़ तक कृषि भूमि रखने की इजाजत है। जबकि भूमिहीन व्यक्ति सिर्फ 250 वर्गमीटर कृषि भूमि खरीद सकता है। इससे अधिक जमीन खरीदने पर उसे राज्य सरकार से अनुमति लेनी होगी। कानून में कहा गया है भूमिहीनों के कृषिभूमि खरीदने के अधिकार सीमित करने वाला यह कानून 12 सितंबर 2003 की तिथि से लागू होगा। इस तिथि से पहली हुई खरीद-फरोख्त इस कानून से प्रभावित नहीं होगी। सर्वेश शर्मा ने उत्तराखंड हाई कोर्ट में रिट याचिका दाखिल संशोधित कानून को चुनौती दी। हाई कोर्ट ने गत 22 सितंबर को संशोधित कानून के प्रावधान निरस्त कर दिए। हाई कोर्ट ने उसे लोगों के बीच भेदभाव और श्रेणियां बाटने वाला कानून बताते हुए संविधान के विरुद्ध माना था।

Friday, September 30, 2011

धूल खा रहीं विधि आयोग की 80 रपटें


जटिल कानूनी मुद्दों पर सरकार को सलाह देने वाले विधि आयोग की 80 रिपोर्टे विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों एवं विभागों में लंबित हैं। इनमें से एक पर तो पिछले 53 साल से निर्णय नहीं किया गया है। आयोग अब तक कानून मंत्रालय को 236 रिपोर्टे सौंप चुका है। कानून मंत्रालय ने रिपोर्टो के दस्तावेजों पर गौर करने के बाद उन पर उचित कार्रवाई के लिए उन्हें संबद्ध मंत्रालयों के पास भेज दिया है। कानून मंत्रालय में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कुल 156 रिपोर्टो को लागू कर दिया गया है। दो रिपोर्टो को हाल में संपन्न संसद के मानसून सत्र के दौरान सदन के पटल पर पेश किया गया था। इनमें धर्मातरण और उच्चतम न्यायालय की कोर्ट फीस से जुड़ी रिपोर्ट शामिल हैं। अनुबंध कानून 1872 के बारे में विधि आयोग की रिपोर्ट संख्या 13 कानून मंत्रालय के विधायी विभाग में 26 सितंबर 1958 से लंबित है। इस रिपोर्ट को राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के पास उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए भेजा गया था, लेकिन आंध्र प्रदेश और पुडुचेरी का जवाब अब तक नहीं मिला है। कानून मंत्रालय ने 28 फरवरी 2011 को उनका जवाब पाने के लिए ताजा स्मरण पत्र भेजा था। गवाह की पहचान सुरक्षा और गवाह संरक्षण कार्यक्रम पर विधि आयोग की 198वीं रिपोर्ट वर्ष 2006 से गृह मंत्रालय में लंबित पड़ी है। संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में आपराधिक कानून और आपराधिक प्रक्रिया के रूप पर बनी रिपोर्ट को सुझाव और दृष्टिकोण जानने के लिए राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को भेजा जा चुका है। अधिकतर राज्य सरकारों की प्रतिक्रियाएं मिल चुकी हैं, जिन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, गृह मंत्रालय लगातार उन्हें स्मरण कराता रहता है। विधि आयोग ने दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ तथा दिल्ली, चेन्नई/हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई में सुप्रीम कोर्ट की अपील पीठ खोलने के विधि आयोग के प्रस्ताव को सरकार खारिज कर चुकी है। विधि आयोग की 229वीं रिपोर्ट कानून मंत्रालय में मई 2009 में जमा की जा चुकी है। विधि आयोग की सिफारिशों को मानने के लिए सरकार बाध्य नहीं है लेकिन संवेदनशील कानूनी क्रियान्वयन में यह उसको निर्णय लेने में सहायता प्रदान करती है

विशेषाधिकार का औचित्य

 सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम को लागू हुए 52 साल बीत चुके हैं। जम्मू-कश्मीर व उत्तरपूर्व में सीमा पार से होने वाले आतंकवाद को रोकने में इससे काफी मदद भी मिली है लेकिन इसकी आलोचना भी खूब हो रही है। उत्तर में जम्मू-कश्मीर और पूर्व में मणिपुर में इसे हटाने की मांग विशेष रूप से उठ रही है, लेकिन क्या यह मांग उचित है? यह समझना जरूरी है कि इस अधिनियम को पुलिस अधिकार नहीं मिले हुए हैं। नागरिक प्रशासन द्वारा किसी क्षेत्र विशेष को अशांत घोषित किए जाने और सेना से मदद के लिए अनुरोध किए जाने पर ही सेना कहीं जा सकती है, लेकिन आलोचकों ने कभी भी सेना की मनमानी और मानवाधिकारों के उल्लंघन के नाम पर खिंचाई करने का कोई भी मौका नहीं चूका है। इस अधिनियम को रद करने की मांग विशेष रूप से उन इलाकों में उठी है जो अलगाववाद और उग्रवाद से ग्रस्त हैं और जो आतंकवादियों और उग्रवादियों द्वारा की जाने वाली हत्याओं और उनके द्वारा निरंतर मानवाधिकारों के उल्लंघन पर मौन साध जाते हैं। अगर दिल्ली उच्च न्यायालय के बाहर बम विस्फोट में कई निर्दोष मुवक्किल और वकील मारे जाते हैं तो मानवाधिकारों के उल्लंघन की आवाज क्यों नहीं उठती और इसकी निंदा क्यों नहीं होती? इस अधिनियम के आलोचक लगातार मुखर हैं और मीडिया भी उनकी बातों को खूब कवरेज देता है। किंतु इसके समर्थकों की बात भी सुनी जानी चाहिए। अत्यंत विपरीत परिवेश में विद्रोहियों के खिलाफ ऑपरेशन चलाने के लिए ही 1958 में सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम लागू किया गया। इसके बाद ही सशस्त्र बल देश के विभिन्न हिस्सों में विद्रोहों पर कारगर ढंग से नियंत्रण करने और स्थिरता लाने में कामयाब हुए। अभी यह अधिनियम उत्तरपूर्व के सात राज्यों में लागू है। बाद में संसद ने जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए सशस्त्र सेना (जम्मू-कश्मीर) विशेषाधिकार अधिनियम 1990 पारित किया जो 5 जुलाई, 1990 से लागू हुआ। शुरू में सरकार ने नियंत्रण रेखा के बीस किलोमीटर के दायरे में पड़ने वाले राजौरी और पुंछ जिलों के इलाकों पर इसे लागू किया और अनंतनाग, बारामुला, कुपवाड़ा, पुलवामा व श्रीनगर को अशांत क्षेत्र घोषित किया। पचास के दशक की तुलना में आज उत्तरपूर्व तथा जम्मू-कश्मीर में विद्रोहियों और उग्रवादियों की लड़ने की क्षमता में काफी सुधार हुआ है। उनके पास आधुनिकतम हथियार, संचार उपकरण और सीमा पार से नैतिक तथा वित्तीय समर्थन है। कई संगठनों में तो महिला सदस्य भी हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा के पास के इलाकों में पड़ोस के देशों से घुसपैठ होती रहती है। सशस्त्र सेनाओं को दूरदराज के घने जंगलों में भारी खतरे के बीच अपनी सुरक्षा के अलावा नागरिक जान-माल की भी रक्षा करनी होती है। इस प्रकार सशस्त्र सेनाओं पर दबाव बना रहता है और उन्हें रिहाइशी इलाकों में ऑपरेशन के दौरान अत्यंत सावधानी बरतनी होती है। किसी भी उल्लंघन की आशंका पर मीडिया की फौरन नजर पड़ती है। ऐसे माहौल में ऑपरेट करने के लिए एक विशेष संरक्षणात्मक कानून की आवश्यकता होती है। किसी क्षेत्र विशेष में एएफएसपीए के प्रावधानों को लागू करने का मतलब है कि वहां हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि पुलिस की मदद से भी राज्य सरकार वहां शांति और सद्भाव कायम नहीं कर सकती। इसका मतलब यह है कि अगर सशस्त्र सेनाओं को सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए बुलाया जाता है तो उन्हें कम से कम पुलिस जैसे अधिकार तो मिलने ही चाहिए। पुलिस अधिकारियों को सीआरपीसी के तहत प्राप्त अधिकारों और एएफएसपीए के तहत सशस्त्र बलों को प्राप्त अधिकारों पर गौर करें तो पांएगे कि पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तारी, तलाशी, जब्ती, गवाहों को बुलाने, रोकथाम के लिए हिरासत में लेने जैसे तमाम व्यापक अधिकार होते हैं जो सशस़्त्र बलों को नहीं होते। इसलिए एएफएसपीए के अधिकारों पर सवाल उठाना किसी भी तरह तर्कसंगत नहीं माना जा सकता। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

शिक्षा अधिकार कानून पर दिल्ली में ही अमल नहीं

 केंद्र सरकार ने छह से चौदह साल तक के बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा का कानून तो बना दिया, लेकिन कुछ राज्य सरकारें अब भी उसे तवज्जो नहीं दे रही हैं। कानून की इस अनदेखी में दिल्ली समेत कांग्रेस और भाजपा शासित राज्य सरकारें भी शामिल हैं। राज्यों के इस उदासीन रवैये के मद्देनजर केंद्र ने उन राज्यों में सर्वशिक्षा अभियान के तहत नए स्कूलों को खोलने के लिए धन देने पर रोक लगा रखी है। सूत्रों के दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सरकार समेत कुछ दूसरे राज्यों ने अब भी शिक्षा का अधिकार कानून पर अमल नहीं शुरू किया है। उसके लिए उन्हें अपने नियम-कायदे बनाकर अधिसूचना जारी करनी थी। यह स्थिति तब है, जब केंद्र की ओर से इस कानून को लागू हुए डेढ़ साल होने जा रहा है। हालांकि दिल्ली के शिक्षा मंत्री अरविंदर सिंह लवली का कहना है कि प्रदेश सरकार ने इस कानून के अपने नियम तो बना लिए हैं, लेकिन कुछ दूसरी औपचारिकताओं के मद्देनजर अधिसूचना अभी नहीं जारी की जा सकी है। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के इस कानून का अनुपालन सर्वशिक्षा अभियान के जरिए ही हो रहा है। लिहाजा मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने बीते मई-जून में सर्वशिक्षा अभियान की चालू वित्तीय वर्ष के लिए परियोजना मंजूरी बोर्ड (पीएबी) की बैठक में ही स्पष्ट कर दिया था कि राज्य सरकारें जब तक कानून पर अमल नहीं करेंगी, उनकी नई परियोजनाओं के लिए स्वीकृत धन जारी नहीं किया जाएगा। बताते हैं कि बीते वित्तीय वर्ष के अंत (31 मार्च, 2011) तक सिर्फ 15 राज्यों ने इस कानून के अमल की अधिसूचना जारी की थी, लेकिन पीएबी की बैठकों में केंद्र की सलाह के बाद दूसरे कई राज्यों ने भी इस पर अमल शुरू कर दिया। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य ने तो अभी लगभग महीने भर पहले ही इस पर अमल शुरू किया है। जबकि आधा दर्जन से अधिक राज्यों ने इस कानून की अधिसूचना अब तक नहीं जारी की है। लिहाजा सर्वशिक्षा अभियान के तहत उनके यहां नए स्कूलों की मंजूरी के बाद भी उसके लिए धन नहीं जारी किया जा रहा है। हालांकि उनकी पिछली स्वीकृत सभी परियोजनाओं का बजट पहले की ही तरह जारी है।