जटिल कानूनी मुद्दों पर सरकार को सलाह देने वाले विधि आयोग की 80 रिपोर्टे विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों एवं विभागों में लंबित हैं। इनमें से एक पर तो पिछले 53 साल से निर्णय नहीं किया गया है। आयोग अब तक कानून मंत्रालय को 236 रिपोर्टे सौंप चुका है। कानून मंत्रालय ने रिपोर्टो के दस्तावेजों पर गौर करने के बाद उन पर उचित कार्रवाई के लिए उन्हें संबद्ध मंत्रालयों के पास भेज दिया है। कानून मंत्रालय में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कुल 156 रिपोर्टो को लागू कर दिया गया है। दो रिपोर्टो को हाल में संपन्न संसद के मानसून सत्र के दौरान सदन के पटल पर पेश किया गया था। इनमें धर्मातरण और उच्चतम न्यायालय की कोर्ट फीस से जुड़ी रिपोर्ट शामिल हैं। अनुबंध कानून 1872 के बारे में विधि आयोग की रिपोर्ट संख्या 13 कानून मंत्रालय के विधायी विभाग में 26 सितंबर 1958 से लंबित है। इस रिपोर्ट को राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के पास उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए भेजा गया था, लेकिन आंध्र प्रदेश और पुडुचेरी का जवाब अब तक नहीं मिला है। कानून मंत्रालय ने 28 फरवरी 2011 को उनका जवाब पाने के लिए ताजा स्मरण पत्र भेजा था। गवाह की पहचान सुरक्षा और गवाह संरक्षण कार्यक्रम पर विधि आयोग की 198वीं रिपोर्ट वर्ष 2006 से गृह मंत्रालय में लंबित पड़ी है। संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में आपराधिक कानून और आपराधिक प्रक्रिया के रूप पर बनी रिपोर्ट को सुझाव और दृष्टिकोण जानने के लिए राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को भेजा जा चुका है। अधिकतर राज्य सरकारों की प्रतिक्रियाएं मिल चुकी हैं, जिन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, गृह मंत्रालय लगातार उन्हें स्मरण कराता रहता है। विधि आयोग ने दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ तथा दिल्ली, चेन्नई/हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई में सुप्रीम कोर्ट की अपील पीठ खोलने के विधि आयोग के प्रस्ताव को सरकार खारिज कर चुकी है। विधि आयोग की 229वीं रिपोर्ट कानून मंत्रालय में मई 2009 में जमा की जा चुकी है। विधि आयोग की सिफारिशों को मानने के लिए सरकार बाध्य नहीं है लेकिन संवेदनशील कानूनी क्रियान्वयन में यह उसको निर्णय लेने में सहायता प्रदान करती है
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