सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम को लागू हुए 52 साल बीत चुके हैं। जम्मू-कश्मीर व उत्तरपूर्व में सीमा पार से होने वाले आतंकवाद को रोकने में इससे काफी मदद भी मिली है लेकिन इसकी आलोचना भी खूब हो रही है। उत्तर में जम्मू-कश्मीर और पूर्व में मणिपुर में इसे हटाने की मांग विशेष रूप से उठ रही है, लेकिन क्या यह मांग उचित है? यह समझना जरूरी है कि इस अधिनियम को पुलिस अधिकार नहीं मिले हुए हैं। नागरिक प्रशासन द्वारा किसी क्षेत्र विशेष को अशांत घोषित किए जाने और सेना से मदद के लिए अनुरोध किए जाने पर ही सेना कहीं जा सकती है, लेकिन आलोचकों ने कभी भी सेना की मनमानी और मानवाधिकारों के उल्लंघन के नाम पर खिंचाई करने का कोई भी मौका नहीं चूका है। इस अधिनियम को रद करने की मांग विशेष रूप से उन इलाकों में उठी है जो अलगाववाद और उग्रवाद से ग्रस्त हैं और जो आतंकवादियों और उग्रवादियों द्वारा की जाने वाली हत्याओं और उनके द्वारा निरंतर मानवाधिकारों के उल्लंघन पर मौन साध जाते हैं। अगर दिल्ली उच्च न्यायालय के बाहर बम विस्फोट में कई निर्दोष मुवक्किल और वकील मारे जाते हैं तो मानवाधिकारों के उल्लंघन की आवाज क्यों नहीं उठती और इसकी निंदा क्यों नहीं होती? इस अधिनियम के आलोचक लगातार मुखर हैं और मीडिया भी उनकी बातों को खूब कवरेज देता है। किंतु इसके समर्थकों की बात भी सुनी जानी चाहिए। अत्यंत विपरीत परिवेश में विद्रोहियों के खिलाफ ऑपरेशन चलाने के लिए ही 1958 में सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम लागू किया गया। इसके बाद ही सशस्त्र बल देश के विभिन्न हिस्सों में विद्रोहों पर कारगर ढंग से नियंत्रण करने और स्थिरता लाने में कामयाब हुए। अभी यह अधिनियम उत्तरपूर्व के सात राज्यों में लागू है। बाद में संसद ने जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए सशस्त्र सेना (जम्मू-कश्मीर) विशेषाधिकार अधिनियम 1990 पारित किया जो 5 जुलाई, 1990 से लागू हुआ। शुरू में सरकार ने नियंत्रण रेखा के बीस किलोमीटर के दायरे में पड़ने वाले राजौरी और पुंछ जिलों के इलाकों पर इसे लागू किया और अनंतनाग, बारामुला, कुपवाड़ा, पुलवामा व श्रीनगर को अशांत क्षेत्र घोषित किया। पचास के दशक की तुलना में आज उत्तरपूर्व तथा जम्मू-कश्मीर में विद्रोहियों और उग्रवादियों की लड़ने की क्षमता में काफी सुधार हुआ है। उनके पास आधुनिकतम हथियार, संचार उपकरण और सीमा पार से नैतिक तथा वित्तीय समर्थन है। कई संगठनों में तो महिला सदस्य भी हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा के पास के इलाकों में पड़ोस के देशों से घुसपैठ होती रहती है। सशस्त्र सेनाओं को दूरदराज के घने जंगलों में भारी खतरे के बीच अपनी सुरक्षा के अलावा नागरिक जान-माल की भी रक्षा करनी होती है। इस प्रकार सशस्त्र सेनाओं पर दबाव बना रहता है और उन्हें रिहाइशी इलाकों में ऑपरेशन के दौरान अत्यंत सावधानी बरतनी होती है। किसी भी उल्लंघन की आशंका पर मीडिया की फौरन नजर पड़ती है। ऐसे माहौल में ऑपरेट करने के लिए एक विशेष संरक्षणात्मक कानून की आवश्यकता होती है। किसी क्षेत्र विशेष में एएफएसपीए के प्रावधानों को लागू करने का मतलब है कि वहां हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि पुलिस की मदद से भी राज्य सरकार वहां शांति और सद्भाव कायम नहीं कर सकती। इसका मतलब यह है कि अगर सशस्त्र सेनाओं को सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए बुलाया जाता है तो उन्हें कम से कम पुलिस जैसे अधिकार तो मिलने ही चाहिए। पुलिस अधिकारियों को सीआरपीसी के तहत प्राप्त अधिकारों और एएफएसपीए के तहत सशस्त्र बलों को प्राप्त अधिकारों पर गौर करें तो पांएगे कि पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तारी, तलाशी, जब्ती, गवाहों को बुलाने, रोकथाम के लिए हिरासत में लेने जैसे तमाम व्यापक अधिकार होते हैं जो सशस़्त्र बलों को नहीं होते। इसलिए एएफएसपीए के अधिकारों पर सवाल उठाना किसी भी तरह तर्कसंगत नहीं माना जा सकता। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
No comments:
Post a Comment