Friday, September 30, 2011

धूल खा रहीं विधि आयोग की 80 रपटें


जटिल कानूनी मुद्दों पर सरकार को सलाह देने वाले विधि आयोग की 80 रिपोर्टे विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों एवं विभागों में लंबित हैं। इनमें से एक पर तो पिछले 53 साल से निर्णय नहीं किया गया है। आयोग अब तक कानून मंत्रालय को 236 रिपोर्टे सौंप चुका है। कानून मंत्रालय ने रिपोर्टो के दस्तावेजों पर गौर करने के बाद उन पर उचित कार्रवाई के लिए उन्हें संबद्ध मंत्रालयों के पास भेज दिया है। कानून मंत्रालय में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कुल 156 रिपोर्टो को लागू कर दिया गया है। दो रिपोर्टो को हाल में संपन्न संसद के मानसून सत्र के दौरान सदन के पटल पर पेश किया गया था। इनमें धर्मातरण और उच्चतम न्यायालय की कोर्ट फीस से जुड़ी रिपोर्ट शामिल हैं। अनुबंध कानून 1872 के बारे में विधि आयोग की रिपोर्ट संख्या 13 कानून मंत्रालय के विधायी विभाग में 26 सितंबर 1958 से लंबित है। इस रिपोर्ट को राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के पास उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए भेजा गया था, लेकिन आंध्र प्रदेश और पुडुचेरी का जवाब अब तक नहीं मिला है। कानून मंत्रालय ने 28 फरवरी 2011 को उनका जवाब पाने के लिए ताजा स्मरण पत्र भेजा था। गवाह की पहचान सुरक्षा और गवाह संरक्षण कार्यक्रम पर विधि आयोग की 198वीं रिपोर्ट वर्ष 2006 से गृह मंत्रालय में लंबित पड़ी है। संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में आपराधिक कानून और आपराधिक प्रक्रिया के रूप पर बनी रिपोर्ट को सुझाव और दृष्टिकोण जानने के लिए राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को भेजा जा चुका है। अधिकतर राज्य सरकारों की प्रतिक्रियाएं मिल चुकी हैं, जिन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, गृह मंत्रालय लगातार उन्हें स्मरण कराता रहता है। विधि आयोग ने दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ तथा दिल्ली, चेन्नई/हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई में सुप्रीम कोर्ट की अपील पीठ खोलने के विधि आयोग के प्रस्ताव को सरकार खारिज कर चुकी है। विधि आयोग की 229वीं रिपोर्ट कानून मंत्रालय में मई 2009 में जमा की जा चुकी है। विधि आयोग की सिफारिशों को मानने के लिए सरकार बाध्य नहीं है लेकिन संवेदनशील कानूनी क्रियान्वयन में यह उसको निर्णय लेने में सहायता प्रदान करती है

विशेषाधिकार का औचित्य

 सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम को लागू हुए 52 साल बीत चुके हैं। जम्मू-कश्मीर व उत्तरपूर्व में सीमा पार से होने वाले आतंकवाद को रोकने में इससे काफी मदद भी मिली है लेकिन इसकी आलोचना भी खूब हो रही है। उत्तर में जम्मू-कश्मीर और पूर्व में मणिपुर में इसे हटाने की मांग विशेष रूप से उठ रही है, लेकिन क्या यह मांग उचित है? यह समझना जरूरी है कि इस अधिनियम को पुलिस अधिकार नहीं मिले हुए हैं। नागरिक प्रशासन द्वारा किसी क्षेत्र विशेष को अशांत घोषित किए जाने और सेना से मदद के लिए अनुरोध किए जाने पर ही सेना कहीं जा सकती है, लेकिन आलोचकों ने कभी भी सेना की मनमानी और मानवाधिकारों के उल्लंघन के नाम पर खिंचाई करने का कोई भी मौका नहीं चूका है। इस अधिनियम को रद करने की मांग विशेष रूप से उन इलाकों में उठी है जो अलगाववाद और उग्रवाद से ग्रस्त हैं और जो आतंकवादियों और उग्रवादियों द्वारा की जाने वाली हत्याओं और उनके द्वारा निरंतर मानवाधिकारों के उल्लंघन पर मौन साध जाते हैं। अगर दिल्ली उच्च न्यायालय के बाहर बम विस्फोट में कई निर्दोष मुवक्किल और वकील मारे जाते हैं तो मानवाधिकारों के उल्लंघन की आवाज क्यों नहीं उठती और इसकी निंदा क्यों नहीं होती? इस अधिनियम के आलोचक लगातार मुखर हैं और मीडिया भी उनकी बातों को खूब कवरेज देता है। किंतु इसके समर्थकों की बात भी सुनी जानी चाहिए। अत्यंत विपरीत परिवेश में विद्रोहियों के खिलाफ ऑपरेशन चलाने के लिए ही 1958 में सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम लागू किया गया। इसके बाद ही सशस्त्र बल देश के विभिन्न हिस्सों में विद्रोहों पर कारगर ढंग से नियंत्रण करने और स्थिरता लाने में कामयाब हुए। अभी यह अधिनियम उत्तरपूर्व के सात राज्यों में लागू है। बाद में संसद ने जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए सशस्त्र सेना (जम्मू-कश्मीर) विशेषाधिकार अधिनियम 1990 पारित किया जो 5 जुलाई, 1990 से लागू हुआ। शुरू में सरकार ने नियंत्रण रेखा के बीस किलोमीटर के दायरे में पड़ने वाले राजौरी और पुंछ जिलों के इलाकों पर इसे लागू किया और अनंतनाग, बारामुला, कुपवाड़ा, पुलवामा व श्रीनगर को अशांत क्षेत्र घोषित किया। पचास के दशक की तुलना में आज उत्तरपूर्व तथा जम्मू-कश्मीर में विद्रोहियों और उग्रवादियों की लड़ने की क्षमता में काफी सुधार हुआ है। उनके पास आधुनिकतम हथियार, संचार उपकरण और सीमा पार से नैतिक तथा वित्तीय समर्थन है। कई संगठनों में तो महिला सदस्य भी हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा के पास के इलाकों में पड़ोस के देशों से घुसपैठ होती रहती है। सशस्त्र सेनाओं को दूरदराज के घने जंगलों में भारी खतरे के बीच अपनी सुरक्षा के अलावा नागरिक जान-माल की भी रक्षा करनी होती है। इस प्रकार सशस्त्र सेनाओं पर दबाव बना रहता है और उन्हें रिहाइशी इलाकों में ऑपरेशन के दौरान अत्यंत सावधानी बरतनी होती है। किसी भी उल्लंघन की आशंका पर मीडिया की फौरन नजर पड़ती है। ऐसे माहौल में ऑपरेट करने के लिए एक विशेष संरक्षणात्मक कानून की आवश्यकता होती है। किसी क्षेत्र विशेष में एएफएसपीए के प्रावधानों को लागू करने का मतलब है कि वहां हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि पुलिस की मदद से भी राज्य सरकार वहां शांति और सद्भाव कायम नहीं कर सकती। इसका मतलब यह है कि अगर सशस्त्र सेनाओं को सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए बुलाया जाता है तो उन्हें कम से कम पुलिस जैसे अधिकार तो मिलने ही चाहिए। पुलिस अधिकारियों को सीआरपीसी के तहत प्राप्त अधिकारों और एएफएसपीए के तहत सशस्त्र बलों को प्राप्त अधिकारों पर गौर करें तो पांएगे कि पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तारी, तलाशी, जब्ती, गवाहों को बुलाने, रोकथाम के लिए हिरासत में लेने जैसे तमाम व्यापक अधिकार होते हैं जो सशस़्त्र बलों को नहीं होते। इसलिए एएफएसपीए के अधिकारों पर सवाल उठाना किसी भी तरह तर्कसंगत नहीं माना जा सकता। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

शिक्षा अधिकार कानून पर दिल्ली में ही अमल नहीं

 केंद्र सरकार ने छह से चौदह साल तक के बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा का कानून तो बना दिया, लेकिन कुछ राज्य सरकारें अब भी उसे तवज्जो नहीं दे रही हैं। कानून की इस अनदेखी में दिल्ली समेत कांग्रेस और भाजपा शासित राज्य सरकारें भी शामिल हैं। राज्यों के इस उदासीन रवैये के मद्देनजर केंद्र ने उन राज्यों में सर्वशिक्षा अभियान के तहत नए स्कूलों को खोलने के लिए धन देने पर रोक लगा रखी है। सूत्रों के दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सरकार समेत कुछ दूसरे राज्यों ने अब भी शिक्षा का अधिकार कानून पर अमल नहीं शुरू किया है। उसके लिए उन्हें अपने नियम-कायदे बनाकर अधिसूचना जारी करनी थी। यह स्थिति तब है, जब केंद्र की ओर से इस कानून को लागू हुए डेढ़ साल होने जा रहा है। हालांकि दिल्ली के शिक्षा मंत्री अरविंदर सिंह लवली का कहना है कि प्रदेश सरकार ने इस कानून के अपने नियम तो बना लिए हैं, लेकिन कुछ दूसरी औपचारिकताओं के मद्देनजर अधिसूचना अभी नहीं जारी की जा सकी है। मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के इस कानून का अनुपालन सर्वशिक्षा अभियान के जरिए ही हो रहा है। लिहाजा मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने बीते मई-जून में सर्वशिक्षा अभियान की चालू वित्तीय वर्ष के लिए परियोजना मंजूरी बोर्ड (पीएबी) की बैठक में ही स्पष्ट कर दिया था कि राज्य सरकारें जब तक कानून पर अमल नहीं करेंगी, उनकी नई परियोजनाओं के लिए स्वीकृत धन जारी नहीं किया जाएगा। बताते हैं कि बीते वित्तीय वर्ष के अंत (31 मार्च, 2011) तक सिर्फ 15 राज्यों ने इस कानून के अमल की अधिसूचना जारी की थी, लेकिन पीएबी की बैठकों में केंद्र की सलाह के बाद दूसरे कई राज्यों ने भी इस पर अमल शुरू कर दिया। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य ने तो अभी लगभग महीने भर पहले ही इस पर अमल शुरू किया है। जबकि आधा दर्जन से अधिक राज्यों ने इस कानून की अधिसूचना अब तक नहीं जारी की है। लिहाजा सर्वशिक्षा अभियान के तहत उनके यहां नए स्कूलों की मंजूरी के बाद भी उसके लिए धन नहीं जारी किया जा रहा है। हालांकि उनकी पिछली स्वीकृत सभी परियोजनाओं का बजट पहले की ही तरह जारी है।