Monday, April 25, 2011

संसद शक्तिमान पर संविधान सवरेपरि


जनता की लोकतांत्रिक भावनाओं का उल्लंघन करके चलने वाली सरकार तकनीकी दृष्टि से दोषहीन हो सकती है पर उसे लोकतांत्रिक सरकार नहीं कहा जा सकता। सांसद भी अगर लोक भावनाओं की परवाह नहीं करते, तो वे सच्चे जन प्रतिनिधि नहीं कहे जा सकते। वे अपने करतबों से संसद को ही संदिग्ध बना देते हैं
अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के विरु द्ध देशव्यापी वातावरण बना दिया है। लोग उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं कि लोकपाल विधेयक का अंतिम स्वरूप क्या बनता है और उसमें भ्रष्ट लोगों को पकड़ने और दंडित करने की क्या व्यवस्था बनती है? अगर उन्हें निराश होना पड़ा, तो यह राजनीति, न्यायपालिका और नौकरशाही में स्वच्छ वातावरण चाहने वालों के लिए एक बड़ा आघात होगा। अन्ना हजारे की कीर्ति को भी धक्का पहुंचेगा। शांति भूषण रु पये-पैसे के मामले में ईमानदार हैं या नहीं? संतोष हेगड़े कर्नाटक के लोकायुक्त के रूप में भ्रष्टाचार को कम करने में सफल हुए या नहीं? एक ही समिति में पिता-पुत्र का शामिल होना क्या अनैतिक नहीं है? ये सभी प्रश्न महत्वपूर्ण हैं लेकिन इन सबसे एक अच्छा लोकपाल विधेयक तैयार करने में कोई बाधा नहीं आएगी। अन्ना स्वयं संयुक्त समिति के सदस्य हैं। इसलिए कोई आशंका नहीं है। इस संदर्भ में जो बात सर्वाधिक चिंताजनक है, वह है अन्ना हजारे का यह बयान कि संसद जो करेगी, हमें स्वीकार्य होगा। इसमें संसद के प्रति सम्मान भाव को सराहनीय कहा जा सकता है। अन्ना हजारे भले ही जन नेता हो गए हों पर जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि तो संसद में ही बैठते हैं। जिन पर संविधान ने कानून बनाने की जिम्मेदारी सौंपी है। लिहाजा कानून तो वही बनेगा जो संसद चाहेगी। यह कानून निर्माण का तकनीकी पक्ष है। लेकिन तकनीकी पहलू की सीमा है। कोई भी देश सिर्फ तकनीकी नियमों-उपनियमों से नहीं चलता। कागज पर सब कु छ ठीक- ठाक हो, फिर भी करोड़ों रु पयों की हेराफेरी हो सकती है। भ्रष्टाचारी हमेशा कानून नहीं तोड़ता। वह कानून के भीतर से ही अपना रास्ता निकालता है। इसीलिए लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए माना जाता है कि जन भावनाओं का भी उचित सम्मान हो। जनता की लोकतांत्रिक भावनाओं का उल्लंघन करके चलने वाली सरकार तकनीकी दृष्टि से दोषहीन हो सकती है पर उसे लोकतांत्रिक सरकार नहीं कहा जा सकता। सांसद अपने करतबों से संसद को ही संदिग्ध बना देते हैं। संसद के दो हिस्से होते हैं। एक हिस्सा सरकार चलाता है और दूसरा हिस्सा उसके कार्यकलाप पर नजर रखता है। कौन नहीं जानता कि इसके बावजूद देश में भ्रष्टाचार इस खतरनाक बिंदु पर पहुंच गया है कि लोग कहने लगे हैं कि सब चोर हैं, सभी पार्टयिां जन विरोधी हैं और हर ताकतवर आदमी या तो भ्रष्ट है या भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। राजनीति के भ्रष्ट हुए बिना इतने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार चल ही नहीं सकता। सरकार के हाथ में जरूरत से ज्यादा शक्तियां हैं। जांच एजेंसियों पर उसका नियंतण्रहै। इनका काम भ्रष्टाचार की खोजबीन करना है। लेकिन चूंकि उन पर सरकार का पूरा नियंतण्रहै, इसलिए वे अपनी जिम्मेदारी के साथ न्याय नहीं कर पातीं। नाजुक मामलों में सरकार उन्हें रोक देती है। अगर कोई अफसर निर्णायक साक्ष्य जमा करने में सफल हो जाता है, तो उसका तबादला कर दिया जाता है। इस तरह सरकार भ्रष्टाचार को काबू में नहीं, अपने काबू में रखती है। जिस पर सरकार का वरदहस्त है, उसे भ्रष्ट साबित करना कठिन हो जाता है। फिर भी कुछ भ्रष्टाचार इतने बड़े पैमाने पर होते हैं कि उनका खुलासा होते ही जनता में आक्रोश पैदा हो जाता है और सरकार को न चाहते हुए भी कार्रवाई करनी पड़ जाती है। अन्ना के अभियान का एक बड़ा मुद्दा राजनीतिक भ्रष्टाचार है। राजनीतिक दलों के नेता और सरकार के मंत्री सभी इस समय संदिग्ध हैं। इसीलिए जन लोकपाल विधेयक में यह प्रावधान रखा गया है कि सांसद, मंत्री और प्रधानमंत्री भी लोकपाल के दायरे में रहेंगे। उनके विरुद्ध आरोपों की जांच करने के लिए लोकपाल को संसद या सरकार की अनुमति नहीं लेनी होगी। लोकपाल की जरूरत ही इसलिए है कि संसद को संसद से और सरकार को सरकार से मुक्त कराया जा सके। अब अन्ना कह रहे हैं कि लोकपाल विधेयक का आखिरी फैसला संसद ही करेगी। यानी संसद ही तय करेगी कि लोकपाल सांसदों के आचरण पर निगाह रख सकता है या नहीं। यानी जो लोग हमारी नजरों में संदिग्ध हैं, वे ही फैसला करेंगे कि उन पर निगरानी रखने की जरूरत है या नहीं? क्या यह एक विचित्र स्थिति नहीं है? संसद सदस्य क्यों चाहेंगे कि ऐसा कोई विधेयक पारित हो जो लोकपाल को यह शक्ति देता हो कि वह सांसदों पर लगाए गए आरोपों की जांच कर सके? संसद सर्वोच्च है, यह एक सचाई है और एक मिथक भी। सचाई इसलिए है कि संविधान में उसे व्यापक अधिकार दिए हुए हैं। सांसदों के बहुमत से ही सरकार का गठन होता है। संसद ही कानून बनाती है। संसद की सर्वोच्चता मिथक इसलिए है कि वह संविधान को, एक हद तक, बदल तो सकती है, पर वह संविधान की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकती। जहां ऐसा अतिक्रमण होता है, न्यायपालिका उसे निरस्त कर सकती है। जब न्यायपालिका ऐसा करती है, तब उसका आधार भी संविधान ही होता है। इस तरह, हम कह सकते हैं कि वास्तव में संसद नहीं, संविधान ही सर्वोच्च है। संविधान की मर्यादाओं से परे कोई नहीं है। जब कोई आंदोलन खड़ा होता है, तो वह संविधान को तोड़ने-मरोड़ने के लिए नहीं, बल्कि संविधान के प्रावधानों को लागू करने-करवाने के लिए ही होता है। इसलिए हमारी राय में, अन्ना साहब को संसद की सर्वोच्चता का नहीं, संविधान की सर्वोच्चता का हवाला देना चाहिए था। लोकपाल विधेयक के संदर्भ में संसद की सर्वोच्चता को स्वीकार करने की घोषणा करके उन्होंने भ्रष्ट सांसदों के लिए एक चोर दरवाजा खोल दिया है। यह भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन पर बहुत भारी पड़ सकता है।


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